जॉइंट फॅमिली और बहु के अरमान

संगीता के विवाह को एक वर्ष होने को आया था लेकिन उसका मन अभी भी परिवार को अपना नहीं पा रहा था। पति विवेक छोटे से व्यवसाय के चलते पास के ही शहर में हर रोज़ आना जाना करते। शाम तो उस की जैसे कैसे कट जाती पर दिन उसे खाने को दौड़ता, उसे १ ननद, १ देवर और सास ससुर से भरा पूरा परिवार सब से बड़ी मुसीबत लगता। 

जॉइंट फॅमिली और बहु के अरमान

संगीता के विवाह को एक वर्ष होने को आया था लेकिन उसका मन अभी भी परिवार को अपना नहीं पा रहा था। पति विवेक छोटे से व्यवसाय के चलते पास के ही शहर में हर रोज़ आना जाना करते। शाम तो उस की जैसे कैसे कट जाती पर दिन उसे खाने को दौड़ता, उसे १ ननद, १ देवर और सास ससुर से भरा पूरा परिवार सब से बड़ी मुसीबत लगता।  उसने तो विवाह के नाम पर बस दो ही लोग समझे थे पर यहाँ तो पाँच लोगों का भरा पूरा-परिवार था। हर समय सोचती कि किसी तरह से हम दोनों शहर में शिफ्ट हो जाएँ।

हर रोज़ विवेक के आते ही उसका एक ही विषय रहता।  रोना-धोना, बहस बस यही सब चल रहा था दोनों के बीच।ना तो संगीता परिवार में किसी से बात करती।एक छोटी ननद सारा दिन जो उसके आगे -पीछे घूमती रहती । उसे भी संगीता जब देखो चार बातें सुना देती। परिवार में सब उसकी बात समझ रहे थे लेकिन वो किसी को समझना ही नहीं चाहती थी । सास-ससुर हमेशा कहते बचपना हैं समझ जाएगी कुछ दिन तक लेकिन वो दिन आ ही नहीं रहा था।

संगीता की तबीयत उस दिन भर थोड़ी ढीली लग रही थी , तो शाम को विवेक के आते ही माँ ने अगले दिन छुट्टी लेकर उसे संगीता के साथ रुकने और उसे डॉक्टर को दिखाने की सलाह दी। खैर अगले दिन चैकअप करके डॉक्टर ने बताया कि संगीता माँ बनने वाली हैं और अभी शुरू के ही दिन हैं। संगीता -विवेक बहुत खुश थे और साथ में घर वाले भी , लेकिन वज्रपात तब हुआ जब संगीता ने शर्त रख दी कि बच्चे का जन्म शहर में ही होगा। मै इस छोटे से कस्बे में बच्चे को जन्म नहीं दूँगी। बहुत मिन्नत करने,  समझाने पर भी वो नहीं मानी तो निर्णय लिया गया शहर में नया और अलग घर बसाने को । घर ढूँढने और शिफ्ट करने में विवेक को एक महीना लग गया और इस एक महीने में उसकी माँ और बहन ने संगीता की सेवा में कोई कसर ना छोड़ी। 

बैड पर बैठे-बैठे हर चीज, सुख-सुविधा, खाना-पीना सब वहीं पर किया जा रहा था लेकिन संगीता को लग रहा था  कि शायद सब उसे बहलाने या उसका शहर जाने का फैसला बदलवाने के लिए ये सब कर रहे हैं। और वो दिन आ गया जब उदास मन से उन्होंने संगीता ओर विवेक को विदाई दे दी। उसकी सास ने बहुत कहा कि साथ में ननद को भी ले जाओ थोड़ी सहायता हो जाएगी पर संगीता का मन मयूर तो बस आज़ादी ढूँढ रहा था ।उसे ननद को साथ ले जाने का बंधन मंजूर नहीं था।

शहर पहुँच कर घर गृहस्थी जमाने में कुछ दिन लग गए । बाहर के काम तो विवेक देख लेता लेकिन घर संगीता को ही  सँभालना पड़ता, एक साल से आराम की जो आदत पड़ गई थी वो भी परेशान कर रही थी और ऊपर से उसकी हालत ऐसी थी कि काम काम करने का मन ना करता । हालांकि विवेक उसका पूरा ध्यान रखता लेकिन घर का वो आराम उसे बहुत याद आता। सासू माँ का जब-जब फ़ोन आ जाता, वो आने को कहती लेकिन संगीता फिर मना कर देती। 

पाँच महीने हो गए थे शहर आए और हालत दिन पर दिन बिगड़ ही रही थी और उस दिन सुबह सुबह उसको जोर से  दो तीन बार चक्कर आया और बेहोश होकर संगीता फर्श पर गिर पड़ी।जब होश आया तो खुद को अस्पताल में बैड पर पाया और साथ ही बैठी थी सासू माँ जो उसके हाथ सहला रही थी ।

ज्यादा सीरियस कुछ था नहीं तो डॉक्टर ने आराम करने की सलाह देकर घर भेज दिया । अब फिर संगीता के वही दिन लौट आये, सासू माँ सारा दिन उसकी मनपसंद चीजें बनाती, प्यार दुलार से खिलाती, ज्यादा उठने पर डाँट भी देती ।  लेकिन अब फर्क ये था कि संगीता को इस सबमें उनका प्यार दिखने लगा, अब उसे सच में परिवार के साथ रहने की कीमत समझ आने लगी थी । एक दिन सासू माँ से पूछ बैठी "माँ आप तो यहाँ हो, घर में सबको कितनी तकलीफ हो रही होगी, सबके खाने-पीने का ध्यान मीनू अकेले कैसे रखती होगी। "

सासु माँ ने जवाब दिया, "सबकी प्रमोशन भी तो होने वाली हैं, तुम सबकी ख़ुशी के लिए नन्हा मेहमान ला रही हो तो सब तुम्हरे लिए थोड़ी परेशानी सह लें  तो क्या हुआ। "

संगीता के मन में ये बात घर कर गई और उसने सासू माँ और विवेक से माफ़ी माँग कर घर वापिस लौटने का फैसला कर लिया । सब बहुत खुश थे और संगीता को समझ आ रहा  था कि संयुक्त परिवार मुसीबत नहीं बल्कि मुसीबत ना आने देने के लिए सबसे बड़ी व्यवस्था, सबसे बड़ा सहारा हैं ।

Madhu Dhiman

Pink columnist-Haryana

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