मेरे दिल के बेहद करीब मेरा शहर 'छपरा'

मेरे दिल के बेहद करीब मेरा शहर 'छपरा'

'छपरा ' बिहार का एक छोटा सा शहर मेरे दिल के इतने करीब है ,ये जब रहती थी तो नहीं मालूम था ।पापा वहीं पोस्टेड थे तो बचपन वहीं बीता। जब वहाँ थी तो यहीं तमन्ना रहती थी कि कब इस छोटे से शहर से बाहर निकलूँ। और देखिए आज जब कभी भी प्रिय शहर की बात उठती है तो सबसे पहले इसी शहर की याद आती है। बचपन से जुड़ी ढ़ेरों मीठी यादें, स्कूल कालेज का यादगार समय , दोस्तों की जुगलबंदी और परिवार से भी बढ़कर अपना पास पड़ोस , जिसे आज के भागते दौड़ते महानगरीय जीवन में बहुत मिस करती हूँ। 

छपरा बिहार राज्य के सारण जिले का महत्वपूर्ण शहर है। यह बिहार की राजधानी पटना से  करीब 73 किलोमीटर की दूरी पर है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ के दहिआवाँ महल्ले में दधिची ऋषि का आश्रम था। इसके पाँच मील पश्चिम रिविलगंज है, जहाँ गौतम ऋषि का आश्रम बतलाया जाता है और वहाँ कार्तिक पूर्णिमा को प्रतिवर्ष बड़ा मेला लगता है।

छपरा से चार मील पूरब चिरांद में पौराणिक राजा मयूरध्वज की राजधानी तथा च्यवन ऋषि का आश्रम था। चिरांद छपरा से 11 किलोमीटर स्थित है जो सारण जिला का सबसे महत्वपूर्ण पुरातत्व स्थल (2000 ईस्वी पूर्व) है। यहाँ पर पुरातत्व विभाग की ओर से खंडहरों की खुदाई हो रही है और कुछ बहुमूल्य ऐतिहासिक तथ्यों के प्राप्त होने की संभावना है। छपरा से 15 मील पूरब गंडक नदी के तट पर सोनपुर स्थान है जो हरिहर क्षेत्र के नाम से विख्यात है। यहीं पर गज और ग्राह के पौरणिक युद्ध का होना बतलाया जाता है। यहाँ शिव और विष्णु के मंदिर साथ-साथ हैं। इस तरह  पौराणिक दृष्टि से यह शहर काफी खास है।

कार्तिक पूर्णिमा को सोनपुर का प्रसिद्ध मेला लगता है जो महीनों चलता रहता है। मौर्य शासक अपने हाथी ,घोड़े तक इस मेले से खरीदते थे, इससे इसकी प्राचीनता का पता चलता है। इस मेले में बहुत बड़ी संख्या में मवेशी - गाय, बैल, घोड़े, हाथी, ऊँट तथा पक्षी विक्रय के लिए आते हैं। वर्तमान में जानवरों के प्रति बढती चेतना और जागरुकता के चलते जानवरों की संख्या में पहले से कुछ कमी आयी है। लेेेकिन आज भी एक महीने के लिए यहाँ विशाल मानव जमघट लग जाता है। हमारे घर का पहला इडली स्टैंड इसी मेले से लिया गया था ,तब आसानी से हर जगह इडली स्टैंड उपलब्ध नहीं होते थे। तो , दक्षिण भारतीय व्यंजन इडली मुझे मेरे मायके (उत्तर भारत) की याद दिलाता है जो तब खूब सोच विचार कर खास दिन बनता था।

18वीं शताब्दी में डच, फ़्रांसीसी, पुर्तग़ाली और अंग्रेजों द्वारा यहाँ शोरा -परिष्करण ईकाइयों की स्थापना के बाद छपरा नदी तट पर स्थित बाज़ार के रूप में विकसित हुआ। 1864 में यहाँ नगरपालिका का गठन हुआ। इसके अलावा यहाँ चीनी के कारखाने, रेल पहिया बनाने का कारखाना भी है।


यहाँ अनेक शिक्षण संस्थान हैं जिनमें छपरा का जिला स्कूल सबसे पुराना है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने इसी स्कूल से पढ़ाई की थी। आज भी मेरा भाई शान से बताता है कि उसने डा.राजेंद्र प्रसाद की पाठशाला में पढ़ाई की है। छपरा के लोगों के लिए आज भी राजेंद्र बाबू बिल्कुल अपने से लगते हैं।

बेहद आम सा दिखने वाला मेरा शहर इतना खास है ये तो मुझे भी नहीं मालूम था। इस ब्लॉग के जरिए थोड़ी बहुत छानबीन की और अपने प्यारे से शहर के बारे में आपके साथ जानकारी शेयर की ....एक खूबसूरत अनुभव मानो मीठे बचपन की एक सैर कर ली हो। 

धन्यवाद.....

आपकी दोस्त 

तिन्नी श्रीवास्तव।


 

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