यह गलती मैं नहीं करुँगी

यह गलती मैं नहीं करुँगी

"आ ना मीनू...खेल न यार... क्या हुआ... क्यों मना कर रही है?"

"नहीं चिंकी मै नहीं आऊँगी... मन नहीं है...तबीयत भी ठीक नहीं।"
न जाने क्यों पर न खेलने का मन ,न कुछ खाने की इच्छा । आज बड़ा अजीब सा हो रहा है उसके साथ। पेट मे भी हल्की सी जलन और शरीर के अंदर जैसे गर्म भाप का भपका रह -रह कर उठ रहा था।वह माँ के पास गई, उसका उतरा चेहरा और पपड़ीदार होंठ देखकर उसकी माँ ने कहाँ,"क्या हुआ हमारी मीनू को..आज इतनी सुस्त क्यों हो?होंठ देख पपड़ी हो रही, सूख रहे।ले मटकी का ठंडा पानी पी।पानी पीते-पीते मीनू की आँखें छलक आई। माँ ने उसके आँसू देखे तो भीतर तक डर गई।
मीनू जो हर बात बेझिझक माँ को बोलती है,चाहे डर हो या तबीयत ख़राब हो या कोई अंकल से बात करना पसंद न हो,कक्षा के कौनसे लड़के को झापड़ मारा,क्यों मारा,क्लास में की गई अपनी शैतानियाँ..।हर बात वह अपनी माँ से कहती थी।फिर रोती भी तो बड़े जोर से ।यूँ अंदर घुट-घुट कर तो रोना मीनू को आता ही नहीं था।
"माँ बहुत अजीब सा लग रहा है,रोना आ रहा है,मन नहीं लग रहा है और ये भी पता नहीं ऐसा क्यूँ हो रहा है।बस पेट में जलन महसूस हो रही है।" 
"अरे तो बताना था न मुझे आ कर।इसमे क्या अभी ठीक हो जाएगा। तु यह ठंडा तरबूज खा। ठंडक लगेगी।गर्मी भी तो बहुत है।" 
तरबूज़ मीनू का फेवरेट था तो वह थोड़ा खाने को मान गई।ठंडा तरबूज़ खाकर उसे थोड़ी राहत मिली तो वह सो गई। मीनू की माँ पहले तो इसे हल्के मे ले रही थी पर अब जरा माथा ठनका। वे सोचने लगी,"मीनू आंठवी कक्षा मे है और गुमसुम सी भी है और पेट मे जलन...अरे ऐसा ही तो उसके साथ भी तो हुआ था जब वह आठवीं की परीक्षा दे कर आई थी।ओह हो सकता है समय आ गया हो। सोचते ही मीनू की माँ के ललाट पर पसीने की बूंदें उभर आई। क्यूँ होता है इन मासूम सी छोरियों के साथ।पूरा बचपन भी नहीं जाता,न पूरी समझ आती है और यह सब । कितना अखरता है।हर मौसम की अपनी अलग परेशानी।और मेरी बच्ची कब इतनी बड़ी हो गई। सोचते -सोचते मीनू की माँ के आगे ,मीनू की माहवारी से लेकर उसके बच्चा जनने तक के दर्द घूमने लगे। आँखें ऐसे बरसने लगी की एक नदी अब बनी, तब बनी।
आँसू पोंछते हुए मीनू की माँ सोचने लगी,"माँ हूँ, मेरे लिये तो मेरी लाडो कभी बड़ी नहीं होगी। पर मुझे तो बड़ा होना होगा। मैं वो कोई गलती नहीं करूंगी जो मेरी माँ ने की। पहले कभी कुछ बताया नहीं और जब इस पीड़ा से पहली बार सामना हुआ तो न प्यार मिला न प्रश्नों के उत्तर मिलें। उस समय जो आत्मविश्वास टूटा उसे अब तक पूरी तरह जोड़ नहीं पाई हूँ मैं। पर अब यह दोहराया नहीं जाएगा।"
मीनू जब नींद से उठी तो उसका चेहरा खिला हुआ था। वह ठीक लग रही थी। माँ ने भी इस अवसर का फायदा उठा कर उसे कहानी के माध्यम से माहवारी के लक्षण बताएं और उस समय जो स्वच्छता और सेहत का ख्याल रखना ज़रूरी होता है वह भी बताया। मीनू ने सब सुनने के बाद तपाक से कहा,"अरे मम्मी, यह सब तो स्कूल में भी मैम ने समझाया था। डरने की कोई बात नहीं, है न मम्मी।" 
"नहीं बेटा डरने की नहीं बस अपना ख़्याल रखने की ज़रूरत है।"
हफ्ता बीता होगा ,मीनू का माहवारी का समय भी आ गया। पर मीनू घबराई नहीं।चेहरा तो उतर गया था उसका ।पर वह डरी हुई नहीं थी। उसे पता था यह नोर्मल है। सबसे बड़ी बात उसकी हर परेशानी का हल ,उसकी माँ है उसके साथ ,अपने पूरे प्यार और अपनेपन के साथ। तो यह दौर भी वह संभाल लेगी। अपना आत्मविश्वास वह नहीं खोएगी।
दोस्तों स्कूल मे आजकल माहवारी से सबंधित जानकारी बच्चियों को समय रहते दी जाती है।पर फिर भी ज़रूरत है हम माँओं को बच्चीयों के स्वभाव मे होने वाले परिवर्तन को पहचानने की।क्योंकि यह बदलाव केवल दैहिक नहीं मानसिक भी होता है। और बच्चे चंचल होते है भूल जाते है सबक और पाठ ।हमें उन्हें याद दिलाना होता है। पर जो सबसे ज़रूरी है इस समय में वह है अपनी बेटियों को भरपूर प्यार और सेहत के प्रति देखभाल।जो आपसे बेहतर और कौन कर सकता है?

धन्यवाद
अनामिका अनु 

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