कहीं आपका बच्चा तो नहीं लॉकर टॉक रूम का हिस्सा ?

कहीं आपका बच्चा तो नहीं लॉकर टॉक रूम का हिस्सा ?

"ब्रो, इस लड़की को बुलाते हैं. हम इसका रेप कर सकते हैं. मैं और लड़कों को बुला लूंगा. हम इसका गैंगरेप कर सकते हैं. हम बहुत कुछ कर सकते हैं.""डूड, ये देख. इसकी न्यूड सेल्फ़ी. मैं 10वीं क्लास में इससे हुकअप करता था, रोज़ मुझे न्यूड्स भेजती थी."
"ब्रो, एक काम करते हैं। जो हमारे ख़िलाफ़ बोल रही हैं ना, उनकी न्यूड्स लीक कर देते हैं।  बड़ी फ़ेमिनिस्ट बन रही हैं।  कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएंगी। "

ये बातें दिल्ली के महंगे, एलीट और मॉर्डन स्कूलों में पढ़ने वाले 15-16 साल के लड़के कर रहे हैं. अपने ही स्कूल में पढ़ने वाली अपनी ही उम्र की लड़कियों के बारे में.ये सारी बातें इंस्टाग्राम पर boieslockerroom नाम के एक ग्रुप में हो रही थीं. किसी तरह इसके स्क्रीनशॉट बाहर आ गए और अब दिल्ली पुलिस की साइबर सेल इसकी जांच कर रही है। 

लॉकर रूम यानी बंद कमरा और बंद कमरे में हुई बातचीत यानी लॉकर रूम टॉक। विस्तृत मायनों में लॉकर रूम टॉक का मतलब मर्दों की उस बातचीत जिसमें औरतें शामिल नहीं होतीं। 

ये लॉकर रूम कहीं भी हो सकता है. जैसे कि कोई वॉट्सऐप या फ़ेसबुक ग्रुप, कोई बार, जिम या ऑफ़िस का कोई हिस्सा, जहां मर्द इकट्ठे होकर औरतों के बारे में चाहे जैसी बातें कर सकते। 

ये जानकर ज़रा भी हैरानी नहीं होती कि बहुत से लोग इन स्कूली लड़कों की चैट को 'प्राइवेट बातचीत' बताकर उसका बचाव कर रहे हैं। लड़के हैं, आपस में थोड़ा 'हंसी-मज़ाक' कर भी लिया तो उसमें क्या दिक़्कत है? ग्रुप में होने वाली ऐसी बातचीत में दरअसल दिक्कतें बहुत सी हैं और दिक्कतों को समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। 

मान लेते हैं कि ये उन लड़कों की निजी बातचीत है. मगर, ये न भूलें कि आपकी निजता का अधिकार वहीं ख़त्म हो जाता है जहां से किसी और की निजता शुरू होती है। अगर आप उस इंस्टाग्राम ग्रुप की चैट देखें तो पाएंगे कि सभी लड़के एक-दूसरे का साथ दे रहे हैं। सब मिलकर लड़कियों के शरीर का मज़ाक बना रहे हैं, सब मिलकर उनके रेप की योजना बना रहे हैं। 

लड़के हँस रहे हैं, रेप की बात कहकर हँसने वाली इमोजी बना रहे हैं और कोई इस पर आपत्ति नहीं जता रहा है.ये सब 'रेप कल्चर' को बढ़ावा देता है. ये ऐसे व्यवहार को 'नॉर्मल' बनाता है। अगर आप एक प्राइवेट ग्रुप में 'रेप जोक्स' शेयर कर रहे हैं, उस पर हंस रहे हैं तो क्या पब्लिक में आने पर आपके विचार अचानक बदल जाएंगे?

माता-पिता बेटियों की 'सेफ़्टी' रहने के नाम पर उन पर बंदिशें लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ते लेकिन बेटों की हरकतों पर कोई सवाल नहीं उठाते। बच्चे एक सांस्कृतिक विरोधाभास में रह रहे हैं. वो ऐसे दौर में हैं जहां सेक्सुअल कंटेट खुलेआम उपलब्ध है।  बच्चों की पहुंच देश-विदेश के सिनेमा तक है. फ़िल्मों में सेक्स सीन, आइटम सॉन्ग और दोहरे अर्थ वाले डायलॉग्स की कमी नहीं होती। 

दूसरी तरफ हमारे समाज में सेक्स विषय पर बात करना एक तरह से वर्जित है।  इससे जुड़े सवालों पर बच्चों को टाल दिया जाता है. प्रेम संबंध परिवार के सम्मान का मुद्दा बन जाते हैं।  इससे बच्चे को लगने लगता है कि उन्हें अपने सवालों का जवाब मां-बाप से नहीं मिलेंगे। 

माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों पर ध्यान दें कि कहीं वे तो किसी "लॉकर रूम  टॉक "का हिस्सा नहीं बन रहे।


अनु गुप्ता 
Pink Columnist

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