नारी सशक्तिकरण के विचारों की प्रणेता " आशापूर्णा देवी"

नारी सशक्तिकरण के विचारों की प्रणेता " आशापूर्णा देवी"

'नारी सशक्तिकरण के विचारों की प्रणेता'- आशापूर्णा देवी

नारी सशक्तिकरण के विचारों को जिन साहित्यकारों ने अपने साहित्य में सर्वोच्च स्थान दिया है, उन लेखकों में महिला लेखिका आशापूर्णा देवी जी का नाम अत्यंत आदर एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। आशापूर्णा देवी जी मूल रूप से बांग्ला भाषा की लेखिका है परंतु इनके कुछ उपन्यासों एवं रचनाओं का हिंदी रूपांतरण हुआ है ।इनके प्रमुख उपन्यासों में प्रथम प्रतिश्रुति, स्वर्ण लता ,बकुल कथा, गाछे पाता नील, जल आगुन, आकाश माटी हैं।

आशापूर्णा देवी जी को 1976 में पदम श्री एवं साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आशापूर्णा देवी जी ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाली पहली महिला लेखिका हैं।

आज मैं आपके समक्ष आशापूर्णा देवी जी के एक उपन्यास प्रथम प्रतिश्रुति की चर्चा करना चाहूंगी। जब हम बहुत छोटे थे तो उन दिनों दूरदर्शन पर 'प्रथम प्रतिश्रुति' एक धारावाहिक के रूप में प्रसारित किया जाता था । उन दिनों हमें कहानी की भले ही ज़्यादा समझ न थी परंतु हम धारावाहिक को बड़े चाव से देखा करते थे ।

यह कहानी उस दौर की कहानी है जब भारत में उपनिवेशवाद अपने चरम पर था। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के कारण गुरुकुल व आश्रम पद्धति समाप्त हो चली थी। लड़कियों की शिक्षा का कोई महत्व ना था। मुख्य रुप से यह सत्यवती नाम की लड़की की कथा है जिसके पिता राम काली ने उसे घर पर ही शिक्षा देने का प्रयास किया।

अन्नपूर्णा देवी जी ने उपन्यास के माध्यम से न केवल स्त्री अधिकारों की बातों को उठाया है बल्कि संकीर्ण मानसिकता व समाज की बुराइयों पर भी चोट की है ।एक दृश्य में बालक राम काली की खड़ाऊ से पिटाई इसलिए होती है कि उसने प्रभु के भोग में पानी नहीं रखा । वह बोलता है कि' उसने रखा था प्रभु ने पी लिया होगा ' उसके पिता जय काली कहते हैं कि 'प्रभु पानी नहीं पीते ' राम काली सोचता है कि जब प्रभु पानी पीते नहीं तो उनके लिए रखते क्यों हैं? इन्हीं राम काली की पुत्री सत्यवती है

उस दौर में बाल विवाह आम बात थी,अतः सत्यवती का भी बाल विवाह हुआ। सत्यवती ने अपनी पुत्री स्वर्ण लता के लिए विरोध के स्वर उठाए। उसने अपनी पुत्री को वे बातें सिखाई जिन्हें सीखने की चाहत उसकी पूरी ना हो पाई थी ।स्वर्ण लता के बाल विवाह का भी उसने विरोध किया परंतु छल से उसका विवाह करवा दिया गया तो सत्यवती ने परिवार का त्याग कर दिया। सत्यवती का यह कदम भी अपने आप में सामाजिक रुढ़ मान्यताओं को तोड़ने का प्रतीक है क्योंकि उस समय महिलाएं सन्यासी बनने की अधिकारी नहीं थी ।

प्रथम प्रतिश्रुति सत्यवती की कथा है तो स्वर्ण लता और बकुल कथा उससे आगे चलने वाले उपन्यासों का क्रम है ।

प्रथम प्रतिश्रुति महिला अधिकारों व सशक्तिकरण की दृष्टि से एक अद्भुत उपन्यास है ।

आशापूर्णा देवी जी की सोच अपने समय से बहुत आगे की थी।

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