आत्महत्या के मापदंड

आत्महत्या के मापदंड

आत्महत्या एक ऐसी हदय विदारक घटना होती है जो देखने और सुनने वालों को अन्दर तक झकझोर देती है |जो व्यक्ति आत्महत्या करता है उसकी मनोदशा क्या होती होगी, किन परिस्थितियों में वह ऐसा कदम उठाता है ये उसके अलावा कोई नहीं जानता

जो यह जघन्य कृत्य करता है |वह किस तरह हार चुका होता है, जीने की सारी उमंगे, सारे जज्बे खत्म हो जाते होगें, वह अन्दर ही अन्दर घुट रहा होता होगा और उसके अन्तर्मन की घुटन और टूटन इस कदर बढ़ जाती होगी कि उसे निराशा के घोर अंधेरों में ले जाती होगी जहां उसे आत्महत्या करने के अलावा कुछ और नहीं सूझता होगा |इस दुनिया से पूरी तरह रूठा और दिल से टूटा हुआ व्यक्ति खूबसूरत जीवन को छोड़ मृत्यु को अपना लेता है और हमेशा के लिए ये दुनिया छोड़कर चला जाता है |बहुत ही विषम परिस्थिति और विचित्र मानसिक दशा में ऐसे कदम उठाये जाते हैं |
अब जरा दृष्टि डालते है आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के प्रति हमारे समाज के लोगों के मापदंड पर |पिछले दो दिन में दो लोगों ने आत्महत्या की |एक था पुरूष लाइमलाइट की चकाचौंध में रहने वाला सुपर स्टार. ...और दूसरी थी एक छोटे से शहर की लड़की |स्टार ने आत्महत्या क्यों की लोगों के दिमाग में ये प्रश्न चल रहा था और लोग उस कारण को जानने की कोशिश कर रहे थे... लेकिन लड़की ने आत्महत्या क्यों की ये किसी ने जानने की कोशिश नहीं की बल्कि कारण बताये जा रहे थे |एक व्यक्ति कह रहा था - किसी लड़के के चक्कर में फंसी थी मां बाप को पता चला तो मार के लटका दिया होगा, एक सभ्य महिला कह रही थी - अरे कुछ महीने पेट से थी, एक जन कह रहे थे - अरे वो तो थी ही चरित्रहीन, छोटे -2 कपड़ें पहनकर घूमा करती थी मौहल्ले में... एक अधेड़ उम्र के सज्जन कह रहे थे - मां बाप ने शादी तय कर दी थी और वह किसी और से लगी हुई थी इसलिए मर गई.... उस लड़की की मनोदशा क्या होती है ये कोई जानने का प्रयास नहीं करता |किन परिस्थितियों में वह ऐसा कदम उठाती है ये जानने में किसी की रूचि नहीं होती |वह एक लड़की है बस इतना ही काफी होता है विभिन्न प्रकार के चरित्र प्रमाण पत्रों से उसको सुशोभित करने के लिए |
मेरी समझ में ये नहीं आता कि आत्महत्या जैसे दिल दहलाने वाले कृत्य में भी हम इतना भेदभाव कर सकते हैं |मरने वाला पुरूष है तो दुखी होगा, परेशान होगा, तनावग्रस्त होगा |मरने वाली नारी है तो चक्कर चल रहा होगा, चरित्रहीन होगी इत्यादि |

हमारी संवेदना कहां मर जाती हैं हम क्यों नहीं सोच पाते कि वह कितने तनाव में होगी, उसकी मानसिक दशा क्या होगी, वो किस तरह टूट चुकी होगी जो जीने की वजाय मौत को गले लगा लिया लेकिन नहीं हम तो ऐसा सोचेगें ही नहीं हमने तो वर्षों से नारी और पुरूष के लिए हर चीज में मापदंड तय करके रखे हैं आत्महत्या जैसी हदयाविदारक घटना के लिए भी |
हमें अपनी सोच बदलनी होगी |मरने वाला पुरूष हो या नारी पहले एक इन्सान है |एक ऐसा इंसान जो टूट चुका है अन्तर्मन से, जो घुट रहा होता है अन्दर ही अन्दर और त्याग चुका होता है ज़िन्दगी जीने की तमन्ना |हमें विचार करना होगा कि किस तरह का तनाव रहा होगा जो एक व्यक्ति ऐसा कदम उठाने पर मजबूर हो गया |हमें दिखानी होगी अपनी संवेदना, बहाने होगें आंसू दोनों के लिए, दहलाना होगा अपना हदय दोनों के लिए, महसूस करनी होगी तकलीफ दोनों की और समझनी होगी मनोदशा दोनों की, त्यागकर वर्षों से बनाये आत्महत्या के मापदंड को |

सीमा शर्मा पाठक 

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