अबला की पीड़

अबला की पीड़

(अबला की पीड़)
उफ्फ़ अब तो बस करो निर्वस्त्र बदन के प्रशंसकों आँखें और चौड़ी कर लो निश्चेतन तन को भी आँखों से नौंच लो। पर, 
इससे पहले मुझ पर बीतीं सुन लो आठ हाथों ने घसीटते हुए बाल खिंचते नौंचते इस अबला को पटका। एक-एक आवरण के हटने पर मेरी शर्मिंदगी भी शर्मा रही थी आँखें मूँदे आक्रोश को पीते अत्याचार झेल रही थी। मेरे निर्वस्त्र तन को समझकर मांस का टुकड़ा चार गीध चाट रहे थे पागलपन की कगार पर खड़े होकर लंपटता से शरारती कर्मों की गठरी बाँध रहे थे।
मैं गुमनामी की अंधेरी गुफाओं की खतरनाक सैर करते कतरा-कतरा कट रही थी उसके भूखे स्पर्श और लालसा सभर कृत्य मेरी जंधाओं को फ़ाड़ रहे थे, शैतानी तरीके से संतुष्ट होते पी रहे थे मेरी पीड़ को।
मेरी मजबूर साँसें रुंध रही थी, बेबसी की ब्लेड चल रही थी मेरी आत्मा पर। सिना छलनी और कमर के नीचे के हर अंग कट रहे थे, फट रहे थे। चार जंगली उपकरण मेरे अस्तित्व को काट-काट कर  टुकड़े-टुकड़े कर रहे थे मेरे हलक में चीख भी चिल्ला रही थी। वासनापूर्ण राक्षसों से जूझते थक कर निढ़ाल बेहोश होते तड़पते आग की लपटों से खेलने लगी। आहिस्ता-आहिस्ता रोम-रोम जलकर ख़ाक़ हो गया, ज़िंदगी से फासला बढ़ता गया।
दरिंदों के अट्टहास अब भी गूँज रहे है मेरी लाश के आस-पास। अब आपकी बारी है देख लो निर्वस्त्र नारी के देह को लाश का भी बलात्कार होता है। देख रही है मेरी रूह सबकी आँखों में सांप लौटते ना कोई नहीं चाहता एक टुकड़ा चद्दर का मेरे तन को नसीब हो। 
एक सवाल क्यूँ रौंदी गई, क्या मेरा लड़की होना ही मेरा कसूर था ?
#भावु

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