अच्छा ही है, मैं बेटी नहीं बन पाई

अच्छा ही है, मैं बेटी नहीं बन पाई

ससुराल में गृह प्रवेश करते ही
मायके से हो गई मैं पराई 
सबकी इच्छायें, सबकी आकांक्षाएँ
घर की जिम्मेदारियाँ अब मेरी हो आई

अपनाकर मैंने उन सबको दिल से 
बचपने की कर दी उसी दिन बिदाई 
बदल गया उपनाम, नाम भी अब मेरा ना रहा 
खुदकी तो अपनी पहचान भी गंवाई 

हाँ जहां रहते है चार बर्तन 
खनक तो देती है सुनाई 
पर इन बातों को विवाद कह सकते हैं 
अपनों से नहीं हो सकती है लड़ाई 

मुझसे कैसे भी व्यवहार करते रहे सब 
बदले में देते रहे संस्कारों की दुहाई 
हाँ सच ही तो है, सहती रही सब 
अम्मा के संस्कारों को कहां बदल पाई 

दुलार में माँ को भी ना कह देती थी मैं 
ससुराल में देने कभी ना नहीं कह पाई 
बुरा ना लग जाये कहीं उन्हें तो 
मायके की कभी नहीं करती मैं बड़ाई 

हाँ निभाती हूं हर फर्ज अपना 
मेरी अच्छाई है मेरे ताउम्र की कमाई 
मुझे ना समझे कोई पर मैं सब समझती हूं 
अच्छा ही है एक तरह से! 
मैं बहू बनी, बेटी नहीं बन पाई

-सुषमा तिवारी

#Thursdaypoetry

#pinkcomrade 

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