अमृता प्रीतम ने रखी थी लिव-इन की नींव!

अमृता  की कवितायें भावना, प्रेम  और संवेदनाओं से भरी होती थीं।अमृता  उस जमाने में  लिव-इन में रहीं, जब ऐसा सोचना भी किसी क्रांति से कम न था।

अमृता प्रीतम ने रखी थी लिव-इन की नींव!

अमृता प्रीतम ने रखी थी लिव-इन की नींव!

रसीदी टिकट से अमर हो जाने वाली अमृता आजाद ख्याल लड़कियों के लिए रोल मॉडल थीं। हालांकि आजादी का मतलब उनके लिए भावनात्मक आजादी और फिर सामाजिक आजादी थी। 
अमृता  की कवितायें भावना, प्रेम  और संवेदनाओं से भरी होती थीं।अमृता  उस जमाने में  लिव-इन में रहीं, जब ऐसा सोचना भी किसी क्रांति से कम न था। 
अमृता की शादी 16 साल की उम्र में  प्रीतम सिंह से हो गई थी। अमृता बेहद भावुक थीं, लेकिन उतनी ही खूबसूरती के साथ उन्हें अपनी भावनाओं और रिश्तों के बीच सामंजस्य बिठाना आता था। बच्चे भी हुए। पर अंतत  साहिर की मुहब्बत के कारण शादीशुदा जीवन से बाहर निकलने का फैसला लिया पर साहिर का साथ भी बहुत न चला । 
जीवन के आखिरी समय में सच्चा प्यार उन्हें इमरोज के रूप में मिला।
इमरोज़ अमृता के जीवन में काफी देर से आये। अमृता कभी कभी कहा करती थीं ‘अजनबी तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते’।

अमृता ने बेहद कम उम्र से लिखना शुरू कर दिया था। महज 16 साल की उम्र में उनका पहला कविता संकलन प्रकाशित हो गया था। जिसकी लेखनी में इतना प्यार और दर्द छुपा हो वो भला खुद प्रेम से कैसे दूर रह सकती थी। और प्रेम को इतनी गहराई से समझनेवाली अमृता को मशहूर शायर और हिंदी फिल्मों गीतकार साहिर लुधयानवी से मोहबेबत हो गई। 
वो भी ऐसी मोहब्बत जो आप किताबों और कहानियों में पढ़ते हो। कुछ ना कहकर भी सब कुछ जान लेना, एक दूसरे को समझ लेना। 
अमृता अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में लिखती हैं कि एक बार उनके बेटे ने उनसे पूछा कि, ‘मां क्या मैं साहिर का बेटा हूं ?’  इस पर अमृता ने जवाब दिया, ‘काश तुम साहिर के बेटे होते।’ कुछ इस कदर गहरा था साहिर और अमृता का प्यार। लेकिन ये प्यार मुकम्मल ना हो सका ।
अमृता एक बेहद प्रसिद्ध लेखिका और कवियत्री थी और इमरोज एक बुक कवर डिजाइनर/पेंटर। दोनों की मुलाकात अमृता की एक किताब के कवर के डिजाइन के सिलसिलें में हुई जो बाद में जिंदगीभर के साथ में तब्दील हो गई। 
बाकी आशिकों की तरह नहीं थे अमृता-इमरोज। कहते है  कि उन दोनों ने कभी एक दूसरे को नहीं बताया कि वो एक दूसरे को कितना चाहते हैं। जब प्यार है तो बोलने की क्या जरूरत

उन्होंने सौ से अधिक कविताओं की किताब लिखी, साथ ही फिक्शन, बायोग्राफी, आलेख और आटोबॉयोग्राफी लिखा, जिसका कई भारतीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। अमृता प्रीतम पहली महिला लेखिका हैं जिन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1982 में उन्हें ‘कागज ते कैनवास’के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 2004 में पद्मविभूषण भी प्रदान किया गया।


अनु गुप्ता

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