"अपने मुंह मियां मिट्ठू" की जय

"अपने मुंह मियां मिट्ठू" की जय

मेरे पड़ोस में रहने वाली आंटी जी की बहू कविता बहुत ही स्वांग रचने वाली महिला है । वो पूरी तरह से भरपूर मात्रा में 'अपने मुंह मियां मिट्ठू " वाली कहावत पर खरी उतरती  है । मुझे उसकी हर समय की रट्टू तोते जैसी बोलियां बहुत नागवार गुजरती है , जैसे मुझे  सफाई बहुत पसंद है , मैं खाना बहुत अच्छा बनाती हूं , और भी तरह-तरह के प्रवचन  उनके मुख मंडल से झड़ते रहते हैं । जैसे सबसे बड़ी सत्यवादी स्वामिनी वही है राजा हरिश्चंद्र के बाद ।

जो इंसान बहुत ज्यादा सच बोलने की डींगे हांकते रहते हैं वहीं सबसे बड़े मक्कार होते हैं ।

कविता अपनी पूजा पाठ के बहुत सारे गुणगान किया करती रहती थी , जबकि मैं हमेशा देखती थी कि उसका पूजा पाठ में मन लगता ही नहीं था ।दिखावे में तो वो पूजा करती थी मगर उसके  कान इधर-उधर की पंचायतों में ही लगे रहते थे कि किसने क्या बोला किसने क्या कहा किसने क्या सुना । कभी-कभी बस नहीं चलता था तो पूजा पाठ करने के बीच से ही बोल देती थी । मैंने एक दो बार कहां भी कि अरे कविता पूजा करते समय ध्यान पूजा में होना चाहिए ना की किसी और की बातों में। और वैसे भी पूजा करते समय बीच में बोलना नहीं चाहिए ।

खैर कविता की माया कविता देवी ही जाने ।

अबकी भी नवरात्रि के 1 दिन पहले कविता मुझसे बोली मुझे तो बहुत श्रद्धा है भगवान पर ,,,, कुछ लोगों को देखो कहने को तो व्रत रहते हैं पर सारा दिन पेट पूजा करते रहते हैं । मुझे देखो मैं तो एक ही समय नमक खाती हूं । देवी माता अपने भक्तों को अपारशक्ति दे देती हैं । जिससे सध जाए वह करें जिससे ना सधे  वह व्रत करने का झूठा आडंबर ना करें ।

मैंने कहा हां कविता कह तो तुम सही रही हो अब देख ना मुझसे तो इतना भारी फलियारी खाना खाया नहीं जाता इसलिए मैं पहला और आखरी व्रत ही करती हूं ।

आज नवरात्रि के चतुर्थी के दिन एक सहेली के यहां से कीर्तन का न्योता आया तो मैं कविता के घर पहुंच गई पूछने कि साथ चलोगी ।

वहां जाकर क्या देखती हूं कि हमारी कविता देवी दिन के 12:00 बजे ही अपना भोज थाल  लिए हुए भोजन कर रही थी । उनके भोज थाल में भुने हुए काफी सारे मखाने  , मूंगफली , आधा दर्जन केले , काफी सारे खोए के पेड़े और एक बड़े  गिलास भर दूध रखा हुआ था , और कविता देवी उसका आनंद उठा रही थी।

मुझे देख पहले तो कविता देवी थोड़ा सा सकपकाई फिर अपने को संयत कर बोली , आओ जया बैठो , यह जरा सा कुछ फल मीठा मै दिन में ले लेती हूं , पर नमक का फलाहार मैं शाम को ही खाती हूं , व्रत में यू सारा दिन घोड़े की तरह चरना थोड़े ना चाहिए । मैंने बोला कि हां तुम ठीक ही  कह रही हो, जबकि मन ही मन मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया और सोचा कह दूं कि चर तो रही हो तुम भी ,  पर गुस्से को दबाकर और उसकी बातों को टालते हुए कीर्तन का समय निश्चित किया घर वापस आ गई

मैंने घर आकर मम्मी जी से सब कहा , तो मम्मी जी बोली ,

"अरे बेटा जाने दे यह कविता तो एक नंबर की झूठी और झल्ली है ।

"पर मम्मी जी भगवान के नाम पर ही हूं झूठ क्यों बोलना यह आडंबर क्यों करना ।अब कविता जो अपना भोज थाल लिए हुए खा रही थी यह भी तो एक तरह से  संपूर्ण आहार हो गया । जब अभी इतना खा रही थी तो शाम को नमक के साथ कितना खाती होगी । और वैसे भी मुझे उसके  खाने पर कोई आपत्ति नहीं है मम्मी , पर यूं झूठ बोलने पर गुस्सा आता है । कविता हर काम में अपनी ही गुणगान करती रहती है ।

"जाने दे बेटा होते हैं कुछ लोग ऐसे ही बड़बोले , किसी दिन अपनी ही बोली से मुंह के बल गिरते हैं। तू शांत हो जा , शाम को जाकर कीर्तन में आनंद उठाना । बेकार की बातों में अपना मूड खराब मत कर।

सच में दोस्तों कुछ लोग वाकई में ऐसे ही होते हैं अपने आसपास कि दिल करता है उनकी सच्चाई उनके मुंह पर बयान कर दें , पर जानती हूं इन बातों का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा । कुछ लोगों के  ऐसे स्वभाव की वजह से अपना मन मार कर चुप रह जाना पड़ता है कौन लगे ऐसे लोगों के मुंह।

©️मोनिका खन्ना


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