अपने से नीचे वालों को, देख कर चलो

अपने से नीचे वालों को, देख कर चलो

भैया....... वो लाल साड़ी ,मेरे लिए पैक कर दो। अरे........ भैया ऐसी सेम साड़ी मुझे भी चाहिए।
नहीं मैडम ...….हमारे स्टोर पर हमेशा एक डिजाइन का सिंगल पीस ही मिलता है ,क्योंकि आजकल कोई भी महिला यह नहीं चाहती कि उसके जैसी साड़ी किसी और के पास भी हो ।
तभी अनीता बहाना करते हुए अरे ..…..वह मुझे अपनी बहन को गिफ्ट देना है.........। इसलिए......….
यह सुन सीमा के दिल में जरा ठंडक पड़ी, कि भाभी को हमेशा मेरी जैसी चीज लेने की  ललक बनी रहती है ।अनीता जेठानी तो थी, सीमा की ,परंतु उसके अंदर बड़प्पन जैसे एक भी गुण नहीं थे।
हर पल सीमा की होड़ करती। उसकी अभी-अभी नई शादी हुई थी, तो वह अपने मायके से जेवर, गाड़ी ,कपड़े बहुत कुछ लाई थी। अनीता जल -भुनकर राख होती रहती। काश! मेरे पास भी यह सब होता।
सारा दिन सीमा को जली- कटी सुनाती ,कि तुम्हारे मां-बाप यह सब अफोर्ड कर सकते हैं ,मेरे नहीं...…
सीमा ,अनीता की बातों पर कोई जवाब ना देती और बस खून का घूंट पीकर रह जाती थी ।
उनके बड़े होने का लिहाज भी करती थी। परिवार में तनाव दिन -प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था ।विजय रेडीमेड गारमेंट्स की दुकान चलाता था ,जबकि रवि एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करता था।
क्योंकि वह बीटेक पास था, इसलिए अच्छा कमाता भी था। दोनों भाइयों में इस बात की कोई बहस बाजी या जलन  नहीं थी ।
रवि बड़ी लगन और मेहनत से काम करता था, जिसके कारण बहुत जल्दी कंपनी में उसका प्रमोशन भी कर दिया और रहने के लिए नया घर और गाड़ी भी पुरस्कार स्वरूप दी गई ।
यह सब देख सीमा की खुशी का तो ठिकाना ही ना रहा। रवि बोला- तुम्हारे कदम इस घर और मेरे लिए बड़े ही भाग्यशाली हैं, जो मुझे तुम्हारे आते ही इतनी तरक्की मिल गई ।लेकिन यह सब देख अनीता के कलेजे पर सांप लोटने लगे ।
रवि ,अनिता भाभी का आशीर्वाद लेने के लिए आता है ,वह उसे आशीर्वाद में मीठे वचनों की जगह कटु शब्दों से भेद देती हैं।
यह सब तुम्हारा है, तुम्हें ही मुबारक हो.....
हमें क्या लेना देना .....
रवि कहता है -भाभी यह घर हम सबका है, आप ऐसा क्यों कहती हैं......
रात को जब विजय दुकान से लौटता है तो अनीता का मुंह फूला देख कर समझ जाता है, कि आज यह क्यों भरी हुई बैठी है ।तब विजय कमर कस  ही लेता है कि आज अनीता की आंखों पर पड़ी, हरिआई की पट्टी को उतारना ही पड़ेगा।
वह आकर  कुछ भी कहता ,इससे पहले अनीता अपनी डिमांड्स की लिस्ट सामने रख देती है, नया घर ,नई गाड़ी ,जेवर आदि।
तब विजय कहता है- कि हमें सदा अपनी चादर के अनुरूप ही पैर फैलाने चाहिए। कभी दूसरों की होड़ नहीं करनी चाहिए ।हमेशा अपने से नीचे तबके वालों को देख कर चलो, तो कभी दुख नहीं होता।
हमें परमात्मा ने बहुत कुछ दे रखा है।
यदि अपने से ऊपर वालों को देखकर चलोगी ,तो कभी खुश नहीं रह पाओगी ।क्योंकि मुंह को ऊपर करके थूकने वालों के मुंह पर ही थूक आकर गिरता है ।इसलिए सदा नीचे देख कर चलो ।
आपकी यह गूढ़ बातें मेरी समझ से बाहर हैं। मुझे यूं बातों में उलझाने की कोशिश आप कतई ना करें। ऐसा कहकर ,अनीता दूसरी तरफ मुंह करके बैठ जाती है।

तब विजय बोला- जरा उन लोगों के बारे में सोचो ,जिनके पास सर ढकने को छत भी नहीं है ,चलने को एक साइकिल भी नहीं है।
वे जिस हाल में है ,खुश हैं ।तो तुम्हें तो भगवान से सभी सुख साधन प्राप्त है ।अतः ईश्वर का धन्यवाद करो और कभी किसी से होड़ मत करो।
पर अनीता कहां मानने वाली थी ,उसे बहुत जल्द कम समय में सीमा से ज्यादा अमीर बनना था ।
उसने विजय को बताए बिना, घर को गिरवी रख दिया और काफी रुपए उधार ले आई।
उन पैसों से उसने नई गाड़ी, जेवर, कपड़े सब कुछ खरीद लिया और ठाठ से रहने लगी। विजय कुछ पूछता, तो कह देती कि यह सब मेरे मायके वालों ने भेजा है ।विजय बोला -तुम्हारे मायके वाले इतना सब कुछ क्यों और कहां से...... वे तो पहले से ही............
कहते हैं  ना ,कि झूठ के पैर नहीं होते। थोड़े ही दिनों में अनीता की कलई खुल गई ।समय पर ब्याज ना पहुंचने पर साहूकार घर आ पहुंचा और पैसा वापस मांगने लगा। अनीता की स्थिति उस वक्त काटो तो खून नहीं, ऐसी हो रही थी ।
विजय तब सारा माजरा समझ जाता है और उन्हें परिणाम स्वरुप घर खाली करना पड़ता है ।यह बाद जैसे ही रवि को पता चलती है वह दौड़ा -दौड़ा ,भाई -भाभी को लेने हाजिर हो जाता है ।
कहता है -आप ही मेरी मां- बाप समान हो ।जबसे मां गई हैं, आप ही मेरी सब कुछ हैं। भाभी मैंने तो पहले ही कहा था- यह घर हम सबका है इसलिए चलिए मेरे साथ..............
यह सुन, अनीता की आंखों से पश्चाताप के आंसू तो लगातार बह रहे थे, किंतु क्षमा याचना के रूप में शब्द एक भी नहीं निकल पा रहा था ।वह रवि के व्यवहार के सामने नि:शब्द हो गई थी और आज भली-भांति समझ गई थी ।सदा अपने से ऊपर देख ,चलने वालों का अंजाम बुरा ही होता है ।

तो दोस्तों मैं अपनी कहानी के अंत में, यही कहना चाहती हूं कि सुखी जीवन का एक ही मूल मंत्र है," सदा अपने से नीचे वालों को देख कर चलो।"

पारुल हर्ष बंसल

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