औरतों पर हो रही हिंसा के पीछे की सबसे बड़ी वजह जाननी है तो महादेवी वर्मा को पढ़िए

इस तरह पग-पग पर पुरुष से सहायता की याचना न करने वाली स्त्री की स्थिति कुछ विचित्र सी है। वह जितनी ही पहुंच के बाहर होती है, पुरुष उतना ही झुंझलाता है और प्राय: यह मिथ्या अभियोगों के रूप में परिवर्तित हो जाती है।’

औरतों पर हो रही हिंसा के पीछे की सबसे बड़ी वजह जाननी है तो महादेवी वर्मा को पढ़िए

औरतों पर हो रही हिंसा के पीछे सबसे बड़ी वजह जाननी है तो महादेवी वर्मा को पढ़िए

महादेवी वर्मा ने महिलाओं की समस्याओं को ही इंगित नहीं किया बल्कि उन्होंने नारीजगत को भारतीय संदर्भ में मुक्ति का संदेश दिया। नारी मुक्ति के विषय में उनका विचार है कि भारत की स्त्री तो भारत मां की प्रतीक है। वह अपनी समस्त सन्तान को सुखी देखना चाहती है। उन्हें मुक्त करने में ही उनकी मुक्ति है।
एक पुरुष के प्रति अन्याय की कल्पना से ही सारा पुरुष-समाज उस स्त्री से प्रतिशोध लेने को उतारू हो जाता है और एक स्त्री के साथ क्रूरतम अन्याय का प्रमाण पाकर भी सब स्त्रियां उसके अकारण दंड को अधिक भारी बनाए बिना नहीं रहती।
 इस तरह पग-पग पर पुरुष से सहायता की याचना न करने वाली स्त्री की स्थिति कुछ विचित्र सी है। वह जितनी ही पहुंच के बाहर होती है, पुरुष उतना ही झुंझलाता है और प्राय: यह मिथ्या अभियोगों के रूप में परिवर्तित हो जाती है।’
 ये अंश महादेवी वर्मा की लिखी कहानी ‘लछमा’ से लिया गया है।

 एक औरत का जब रेप होता है या उसके साथ किसी भी तरह की हिंसा होती है तो सारी दुनिया इसके पीछे औरत की ही गलती ढूंढने लग जाती है। हमारी सोच इस कदर गढ़ दी गई है कि हम हर बात के लिए लड़कियों पर ही उंगली उठाते हैं।

महादेवी जी का जीवन तो एक संन्यासिनी का जीवन था ही। उन्होंने जीवन भर श्वेत वस्त्र पहना, तख्त पर सोईं और कभी शीशा नहीं देखा। 
वे बौद्ध धर्म से काफी प्रभावित थी और बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहती थी। जिसकी शिक्षा उन्होंने शादी के बाद भी जारी रखी।

महादेवी अपनी लेखनी से सजगता और निडरताके साथ भारत की नारी के पक्ष में लड़ती रहीं। नारी शिक्षा की ज़रूरत पर जोर से आवाज़ बुलंद की और खुद इस क्षेत्र में कार्यरत रहीं। 

वर्तमान युग के पुरुष ने स्त्री के वास्तविक रूप को न कभी देखा था, न वह उसकी कल्पना कर सका। उसके विचार में स्त्री के परिचय का आदि अंत इससे अधिक और क्या हो सकता था कि वह किसी की पत्नी है। कहना न होगा कि इस धारणा ने ही असंतोष को जन्म देकर पाला और पालती जा रही है।’

नारी में यौन तत्व को ही प्रधानता देनेवाली प्रवृतियों का उन्होंने विरोध किया। उनके अनुसार निर्जीव शरीर विज्ञान ही नारी के जीवन की सृजनतात्मक शक्तियों का परिचय नहीं दे सकता। उनका मानना है कि ‘अनियंत्रित वासना का प्रदर्शन स्त्री के प्रति क्रूर व्यंग ही नहीं जीवन के प्रति विश्वासघात भी है


अनु गुप्ता

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