बड़ी बहन हो आप मेरी

बड़ी बहन हो आप मेरी

नेहा की शादी एक संयुक्त परिवार में हुई थी। घर में सास ससुर के अलावा जेठ जेठानी भी साथ ही रहते थे। नेहा की जेठानी का स्वभाव बहुत ही अच्छा था। वह नेहा से उम्र में कुछ वर्ष ही बड़ी थी, दोनों के विचार भी काफी मिलते थे इसलिए दोनों देवरानी जेठानी कम, सहेलियों की तरह ज्यादा रहती थीं।
स्नेहा कामकाजी थी, फिर भी वह घर के हर काम में पूरी तन्मयता से हाथ बंटाती। नेहा की जेठानी उसके मना करने के बावजूद भी ज्यादातर काम खुद ही कर देती थी। नेहा जब भी अपने लिए कुछ खरीदती तो वह उनके लिए भी वही चीज लेकर आती। उसकी जेठानी कई बार मना भी करती कि "तुम इतना खर्चा क्यों करती हो? करना तो मुझे चाहिए मैं बड़ी हूं।"
तो नेहा हंसते हुए जवाब देती "रिश्तो में बड़ा छोटा नहीं, प्यार व सम्मान देखा जाता है। जो मुझे आप से भरपूर मिल रहा है।"
नेहा के जेठ की नौकरी कुछ महीनों पहले छूट गई थी, इसलिए नेहा को उनकी आर्थिक हालत पता थी। नेहा के पति भी जब तब उनकी मदद कर देते थे। दोनों ही भाइयों में भी बहुत प्रेम था।
हां नेहा की ननंद को नेहा और भाभी का इस तरह  मिलकर रहना पसंद नहीं था। कई बार बातों बातों में कह भी देती कि "देवरानी जेठानी कभी सहेली नहीं बन सकती। ये सब फिल्मों में ही अच्छे लगते हैं। "
वे दोनों ही उनकी बातों पर कान न धरती थी। शादी के 1 साल बाद नेहा ने प्यारी सी बिटिया को जन्म दिया। जापे के लिए उसकी ननद आई। थोड़ा बहुत काम कर  या तो वह सो जाती या फिर अपनी मां के साथ बैठ गप्पे लड़ाने लगती।

बिटिया सिजेरियन हुई थी तो डॉक्टरों ने उसे हल्का खाना, फल व जूस पीने के लिए कहा। नेहा की जेठानी उसके खाने-पीने का पूरा ध्यान रखती । दोपहर में उसे फल काट कर देती या जूस  देती तो नेहा  उन्हें भी ये सब खाने को कहती तो वह मना कर देती। तब नेहा कहती
"दीदी अगर आप नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाऊंगी। मेरे लिए आप कितनी भागदौड़ कर रही हो इसलिए आप भी अपनी सेहत का पूरा ध्यान रखो।"
यह देख कर उसकी ननद चिढ़ते हुए कहती "हां यही तो तुम्हारी सेवा पानी कर रही है। हम तो खाली बैठे हैं।"
तब नेहा हंसते हुए कहती " अरे दीदी बुरा क्यों मान रही हो। आप भी सारा दिन लगी रहती हो।"
  एक दिन घर में फल खत्म हो गये थे। तो नेहा के पति ने अपनी बहन से कहा "दीदी कौन-कौन से फल लेकर आऊं।"

यह सुन वह मुंह बनाते हुए बोली "जो तुझे लाने हो वो ले आ। वैसे भी नेहा तो खाती नहीं। सारी सेहत तेरी भाभी ही बना रही है।" कह वह हंसने लगी।
ये सुनकर नेहा की जेठानी का मुंह उतर गया और वह चुपचाप उठकर वहां से चली गई। नेहा ने अपनी ननद को कहा
"दीदी आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए था।"
नेहा शुरू से ही देखती आई  थी कि उसकी ननद उसके और उसकी जेठानी के बीच में फूट डलवाने की कोशिश करती रही है लेकिन उसने मन ही मन सोच लिया था कि वह अपनी ननद के इन बेईमान इरादों  को कामयाब नहीं होने देगी।

दोपहर को जब नेहा की जेठानी उसे फल देकर जाने लगी तो नेहा ने उसे अपने पास बैठा लिया और बोली

"दीदी सुबह वाली बात आपको बुरी लगी ना? मैं उसके लिए दीदी की तरफ से आपसे माफी मांगती हूं।"
यह सुन वह बोली "नहीं नेहा मुझे कुछ बुरा नहीं लगा| तुम खाओ, मैं अभी आती हूं।"

"अगर आपको बुरा नहीं लगा तो आप यहीं बैठकर मेरे साथ खाओ।"
"मैंने अभी खाना खाया है। तुझे इनकी ज्यादा जरूरत है।"

"दीदी मैं आपको अपनी जेठानी नहीं बड़ी बहन मानती हूं और मैं नहीं चाहती कोई अपनी बेतुकी बातों से हमारे बीच दरार पैदा करे। आप तो दीदी के स्वभाव को मुझसे बेहतर जानती हो। उनके स्वभाव को तो हम बदल नहीं सकते और ना उस रिश्ते से मुंह मोड़ सकते। वह तो आजकल में चली जाएंगी। रहना हम दोनों को साथ है। तो क्यों दूसरों के कहने से अपना मन खराब करें। जिंदगी में ऐसी छोटी मोटी बातें चलती रहेंगी पर मेरा वादा है कि मैं कभी भी अपने अनमोल रिश्तो को इनकी भेंट नहीं चढ़ने दूंगी। मैं सही कह रही हूं ना दीदी।"
"हां पगली तू बिल्कुल सही कह रही है। छोटे होकर भी तूने मुझे जिंदगी का एक पाठ पढ़ा दिया कि जो हमारी कद्र ना करे उनकी बातों को दिल पर ना लगाएं। बल्कि जहां से तुम्हें मान सम्मान व प्यार मिले, उन रिश्तों की कद्र कर हमेशा उन्हें सहेजने का प्रयास करें।" कहते हुए उसने नेहा को गले लगा लिया ।
सरोज✍️

# ससुराल में पहला कदम

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