बन फरिश्ता, निभाया राखी का रिश्ता।

भाई भी अपनी बहन को जीवन पर्यंत खुश देखना चाहता है, विषम परिस्थितियों में भी भाई- बहन एक दूसरी के ऊर्जा पुंज बन जाते हैं।

बन फरिश्ता, निभाया राखी का रिश्ता।

भाई- बहन, ईश्वर का एक अद्भुत उपहार है ।भाई बहन का अटूट रिश्ता शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। श्रवण मास की पूर्णमासी को बनाए जाने वाले राखी का त्यौहार इस रिश्ते को एक मजबूती प्रदान करता है। राखी या रक्षाबंधन, हर बहन के लिए किसी देव पूजन से कम नहीं। भाई के जीवन में सदैव खुशियां, अच्छा स्वास्थ्य, समृद्धि की कामना हर बहन करती है, वही भाई भी अपनी बहन को जीवन पर्यंत खुश देखना चाहता है, विषम परिस्थितियों में भी भाई- बहन एक दूसरी के ऊर्जा पुंज बन जाते हैं।
निम्न श्लोक इस भावना का परिचायक बन जाता है-
  "ऊं एन बध्दो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:,
  तेन त्वा मनुबधनानि रक्षे माचल मात्र"।।
 
  अर्थात-जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधती हूं जो तुम्हारी रक्षा करेगा।।
  इस श्लोक को मैंने चरितार्थ होते हुए देखा है, कैसे एक बहन अपने हाथों से बचपन में खिलाएं अपने छोटे भाई की जान बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा देती है।
   मेरे ताऊ जी के बेटे एक दिन स्कूल में  खेलते-खेलते  गिर गए। प्राथमिक इलाज के बाद वह ठीक हो गए लेकिन उनके कमर व पीठ में अक्सर दर्द रहने लगा, दवाइयां लेकर दर्द कुछ समय के लिए खत्म हो जाता पर लंबे समय तक कोई भी दवाई उन्हें आराम नहीं दे पाती। टाउन से बाहर भी उन्हें कई डॉक्टरों को  दिखाया गया, पर उन्हें ज्यादा आराम नहीं आ पाता था, इसी तरह उनका इलाज चलता रहता, जो अब उनके जीवन का एक हिस्सा बन गया था साथ ही वह अपनी पढ़ाई पूरी कर अपने काम में लग गए और उम्र के साथ-साथ उनकी यह तकलीफ भी बढ़ने लगी, डॉक्टर का इलाज चलता रहा, इसी बीच वह अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गए, वह अपना पूरा ध्यान रखते थे , उनके प्यारे -प्यारे दो बच्चों के साथ परिवार पूर्ण हो गया ,कामकाज भी भगवान की दया से अच्छा चल पड़ा ।अचानक ही उनकी तबीयत खराब हो गई और उन्हें दिल्ली के बड़े अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
  चेकअप के बाद डॉक्टर ने बताया कि भाई की किडनी सही से काम नहीं कर रही है जल्दी ही उन्हें किडनी ट्रांसप्लांटेशन कराना पड़ेगा, यहां सुनते ही परिवार में खामोशी छा गई, कुछ सालों की शादी और दो छोटे-छोटे बच्चों का चेहरा सबकी आंखों के सामने छाने लगा। इसी बीच परिवार के अन्य सदस्य किडनी डोनर के इंतजाम में लग गए, समय कम होता जा रहा था और किडनी डोनर का प्रबंध नहीं हो पा रहा था, कई परिवार वालों के ब्लड टेस्ट भी हुए पर कोई भी किडनी डोनेट करने  योग्य नहीं मिला।
  उधर भैया की बिगड़ती तबीयत की खबर उनकी बड़ी बहन तक पहुंची, जिन के   दो बच्चे   हैं, जो उस समय अपनी पढ़ाई कर रहे थे,बच्चों को अपने रिश्तेदार के पास छोड़, पति संग वह भी अपने भाई को देखने दिल्ली पहुंच गई,डॉक्टर की चिंता जान और भाई की बिगड़ती हुई तबीयत देख ,उन्होंने निश्चय कर लिया कि वह अपने भाई को अपनी किडनी डोनेट करेंगी, उनकी सारे चेकअप शुरू हो गए और एक बहन फरिश्ता बन अपने भाई की जान बचाने पहुंच गई। जब उन्हें किडनी डोनेट करने के सारे नियमावली के अनुसार पाया गया तो उन्होंने बिना हिचकिचाहट अपनी एक किडनी अपने भाई को डोनेट कर दी। और भगवान के बनाए हुए इस निश्चय प्रेम का साधक बन गई।
  दीदी द्वारा भाई को दिया गया उपहार अमूल्य है। उन्होंने रक्षा-बंधन यानी कि सदैव रक्षा करने का जो प्रण भाई -बहन के इस पर्व में लिया, उसे अपनी जान पर खेल कर  पूरा कर दिखाया।
  उन्होंने ना कि अपने भाई की जान बचाई बल्कि एक विवाहिता के सिंदूर की रक्षा की, और मासूम बच्चों के पिता को मुसीबतों के भंवर से बाहर ले आई।
  दीदी ने रक्षाबंधन का मान रख, भाई -बहन के प्रेम को अमर कर दिया।
  ईश्वर सदैव भाई-बहन के इस रक्षा बंधन के पर्व को अपना आशीष प्रदान करते रहे, इसी कामना के साथ आप सब सखियों को राखी की हार्दिक शुभकामनाएं।
  #भाई और मेरा बचपन

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