बैंगलोर तब और अब

बैंगलोर तब और अब
बैंगलोर का मेरे दिल में एक खास स्थान है। तकरीबन 22 साल हो गए मुझे यहाँ आए। अब तो इस शहर से भी अत्यधिक जुड़ाव महसूस करती हूँ। कभी-कभी मातृभूमि का आकर्षण हावी होता है लेकिन कर्मभूमि के प्रति अपनी कर्तव्यबद्धता नए शहर और नए परिवेश में खुदबखुद ढ़लना सिखा देती है। वैसे देखा जाए तो दोनों जगह अपने आप में बेमिसाल हैं और दोनों ने मेरे जीवन के हर पड़ाव पर अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। लेकिन आज बात करूँगी मैं बैंगलोर की। इसी शहर ने मेरी खुद से पहचान कराई । यहीं है वो शहर जहाँ से मेरी गृहस्थी की शुरुआत हुई है।आज भी उन मीठे दिनों को याद कर मन प्रफुल्लित हो जाता है । आज इस ब्लॉग के जरिए मैं उन्हीं पुरानी यादों में आप सबको लेकर चल रही हूँ.....बैंगलोर तब और अब ! 
सच, बैंगलोर मेरे देखते देखते काफी परिवर्तित  हो गया है। तब ना तो इतनी गंभीर ट्रैफिक की समस्या थी ,ना ही जल संकट और ना ही गर्मी या सर्दी एक खास सीमा से पार होती थी। तब एपार्टमेंट कल्चर भी नया नया ही शुरू हुआ था। पुराना मोहल्ला , छोटे बड़े करीने से बने हुए घर और चारों तरफ फैली हरियाली।कहीं अमलतास तो कहीं गुलमोहर तो कहीं चंपा के पेड़ और इन सबके साथ एक अलग मौसम और एक अलग स्मृति जुड़ी हुई है। जब पुराने बैंगलोर को याद करती हूँ तो एक अलग सी तस्वीर उभर कर सामने आती है। आइए चलेंं 'ओल्ड बैंगलोर चार्म' की सैर पर........
हमारे यहाँ उत्तर भारत में सुबह होती है मंदिर में बज रहे हनुमान चालीसा या अनूप जलोटा ,हरिओम शरण के भजनों की मीठी धुन के साथ और यहाँ मेरी सुबह होती थी अगल बगल के घरों से आते विष्णु सहस्रनाम मंत्रोच्चार या एम.एस सुब्बुलक्ष्मी के सुमधुर भजनों से। मन वहाँ भी पावन हो जाता था और यहाँ भी, भले ही भाषा अलग हो पर वातावरण की पवित्रता एक सी होती। सिर पर टोकरी लिए औरतें या साइकिल सवार आदमी "उआ उआ" बोलते निकल जाते। कमरे के अंदर से पता ही न चलता क्या बेच रहे हैं। मैं भागकर जाती तो देखती रंग-बिरंगे फूल ...गुलाब, चमेली ,गेंदा लिए फूल बेचने वाले हैं। एक बार फिर रास्ते, गलियाँ ,बालकनी गमक गमक जाता। सच ,वो सुबह अब कहाँ होती है !
 
 तब का बैंगलोर आज के महानगरीय बैंगलोर के जितना स्मार्ट और भागमभाग वाला नहीं था। तब ,एक ठहराव था। अड़ोसी पड़ोसी मुझ जैसी दूसरे प्रदेश से आई लड़की को भी उतने ही अपनापन से अपनाते जैसे मैं हमेशा से उनके साथ ही थी। महिलाएं सब्जी खरीदने जातीं और ठेले वाले के इर्दगिर्द घंटों बतियातीं। मुझे भी अपने रंग में मिला लेती ,टूटी फूटी हिंदी ,कुछ अंग्रेजी और कन्नड़ मिलाकर एक नई भाषा में मेरे साथ गप्पियाती और सबसे अच्छी बात मुझे अब उनकी बातें समझ भी आने लगी थी ।मैं उनके सधे हाथों से बनी रंगोली को आश्चर्यचकित होकर निहारती और वो, मेरी नई - नई  सहेलियाँ, झटपट कॉपी कलम से मुझे डिजाइन बनाकर समझाया करतीं कि बहुत आसान है तुम भी बनाओ। वो दिन अब फुर्र..हो गए। आज सब अपने आप में व्यस्त हैंं ....फ्लैट में दरवाजे के सामने रंगोली वाला एक टाइल लगाकर सुबह की ये खूबसूरत रीति लगभग समाप्त ही हो गई है।
किसी भी पर्व त्यौहार पर छोटी छोटी लड़कियों का खूब सज सँवर का अपने खास लहंगा ब्लाउज में एक घर से दूसरे घर घूमना अब कहाँ दिखता है। मुझे आज भी याद है ये नटखट लड़कियाँ मेरे पास आतीं और मेरे दिए अलग तरीके के स्नैक्स का खूब लुत्फ उठातीं। मेरे बालों में भी फूल लगाया करतीं और फिर माँ का दिया 'बायना' बिल्कुल दादी अम्मा की तरह मुझे थमातीं। वैसे तो यहाँ के लोग आज भी अपने सभी पारंपरिक रीतिरिवाजों को निभा रहे हैं पर आज से बीस साल पहले ये सब और भी नियमानुसार और परंपरागत रूप से चलता था। 
 
एक और बात है... हमारी तरफ जून का महीना मतलब गर्मी छुट्टी और ठीक इसके विपरीत यहाँ बच्चों की पहली जून से नई कक्षाएँ शुरू होती हैं । शुरू-शुरू में तो बड़ा अजीब लगता था। और सबसे मजेदार तब, जब इसी महीने में अचानक ठंड शुरू हो जाने पर हल्की शॉल या स्वेटर लेने की नौबत आ जाए तो अपने जेहन में बैठी 'जून की गर्मी' इस बात को कतई गँवारा नहीं करती थी। पर अब आदत हो गई है । यहाँ कंबल सालोंभर ऊपर ही रहता है और मोटे-मोटे रजाई से तो हमेशा से ही दूरी रही है।
 
आज भी बैंगलोर वहींं है पर अब कहाँ वो 'बैंगलोर 'जिसे देखकर मैंं रीझ उठी थी ! 
 
तिन्नी श्रीवास्तव।
 
#मेराशहरमेरीपहचान
#मेरेशहरसेजुड़ीमेरीयादें

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