चूड़ियाँ

चूड़ियाँ

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चूड़ियाँ 


फिर खनकी आज हरी लाल चूड़ियाँ, 
मन मे बहकी फिर यादों की लड़ियाँ ,
बचपन के वो दिन और माँ की बातें, 
चूडियों की खनक वालो थपकियाँ। 

सीने से चिपका कर रखती थी वो ,
सहलाती पुचकारती माथे को मेरे,
खनकती चूडियों का सुन्दर संगीत, 
सुनाती थी मुझे मीठी वो लोरिया।

अलसुबह उठ काम करते हुए, 
अलसाई नींद में गूंजती आवाज,
चक्की की घन घन आवाज़ और, 
मद्धम मद्धम स्वर की लहरियां ।

छोटी छोटी लोई बना आटे की ,
खनकती चूडियों संग बेलती ,
सेकती चूडियों को बचाते हुए, 
बड़े प्यार से वो गोल रोटियाँ। 

आते घर में मेहमान तो माँ, 
बाबा का इन्तजार करती ,
दरवाजे के पास जा बुलाने के लिए, 
बाबा को बुलाती थी माँ की चूड़ियाँ। 

जब भी खुश होती थी माँ, 
खिलखिला कर हँसते हुए, 
गुदगुदी चलाती मेरे बगल में,
अधरों पर छाती गुस्ताखियाँ ।

चूड़ी वालों हाथों से जब वो ,
मेरे बालों को सहलाते हुए, 
करती थी गुनगुना तेल से मसाज, 
बहुत अच्छी लगती नरम उँगलियाँ ।

बाबा मेले से लाते थे कभी-कभी, 
माँ के लिए लाल रंग की चूड़ियाँ, 
बड़े प्यार से सहेज कर रखती ,
पहनती जतन से न करती गल्तियां। 

बाबा क्या गये दुनियाँ से अब तो,
खनकती नही माँ की वो चूड़ियाँ, 
वो हरी लाल लाल चूड़ियाँ ,
बिखरी चूड़ियाँ खो गई मस्तियाँ। ।

डा राजमती पोखरना सुराना भीलवाड़ा राजस्थान 

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