श्रद्धा सुमन अर्पित

एक ऐसा  इंसान जो अपनी मिट्टी से जुड़ा हुआ था ।जिसने सिने जगत के मायने बदल दिये।ये वो दौर था।जब कमर्शियल फ़िल्में बना करती थीं ।तब पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों को बहुत खूबसूरती किया इन्होंने ।जी मैं बात कर रही हूँ बासु चटर्जी ।

श्रद्धा सुमन अर्पित

एक ऐसा  इंसान जो अपनी मिट्टी से जुड़ा हुआ था ।जिसने सिने जगत के मायने बदल दिये।ये वो दौर था।जब कमर्शियल फ़िल्में बना करती थीं ।तब पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों को बहुत खूबसूरती किया इन्होंने ।जी मैं बात  कर रही हूँ बासु चटर्जी ।

जो की अच्छी पटकथा के साथ उम्दा निर्देशक भी थे।इनका जन्म10जनवरी सन्1930 में अजमेर में हुआ था ।इनकी शिक्षा आगरा और मथुरा में हुई थी ।निर्देशक बनने से पहले प्रसिद्ध पत्रिका टैबलॉयड ब्लिटज में बतौर कार्टूनिस्ट कैरियर की शुरुआत की थी ।लेकिन बासु भट्टाचार्य के साथ सहायक के तौर पर राजकपूर और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म "तीसरी कसम" में काम करने के बाद कैरियर की राह बदल ली।

1969 में " सारा आकाश "की पटकथा लिख कर फ़िल्मी दुनिया में आगाज़ किया ।और फिर इस फिल्म इंडस्ट्रीज में आ गये।बासु भट्टाचार्य और ऋषिकेश मुखर्जी के साथ इन्होंने काम किया।इन्होंने अपनी फिल्मों के माध्यम से जिन्दगी के उतार-चढ़ाव को बहुत खूबसूरती से पेश किया है रजनीगन्धा, पिया का घर, बातों बातों में, शौकीन, मंजिल, खट्टा-मीठा, दिल्लगी, चितचोर चमेली की शादी और कई बेहतरीन फिल्में ।इनकी फिल्मों की पृष्ठभूमि मध्यवर्ग के इर्द-गिर्द घूमती।अपनी फिल्मों के माध्यम से बेहतरीन कलाकारों को पेश किया, अमोल पालेकर, विजेन्द्र घाटगे,विधा सिन्हा और जरीना वहाब .......

इनकी फ़िल्मों का संगीत और उनके बोल जीवन के सुख-दुःख में एक संजीवनी का काम करते है खट्टा-मीठा फिल्म का ये गीत "थोड़ा है थोडे की जरूरत है ...."और पिया का घर फिल्म का ये गीत घर"ये जीवन हैं इस जीवन का ..."आज भी जब आप इन गीतों को सुनते  हैं  तो उमंगो से भर देते हैं ।इनके इसी हुनर को सबने  कियाा ।हर वर्गइनकी फिल्में बड़े चाव से देखता है।बासु दा काफी पुरस्कारों से सम्मानित किया गया ।

सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले के लिए अवॉर्ड, क्रिटिकल के लिए अवॉर्ड,बेस्ट मूवी आवॅर्ड......सर्वश्रेष्ठ निर्देशक "स्वामी "फिल्म के लिए और राष्ट्रीय पुरस्कार "दुर्गा "फिल्म के लिए । लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।नारी के स्वरूप को जिस सादगीपूर्ण से पेश किया है अपनी फिल्मों के माध्यम से जो अपनी जिन्दगी को अपने तरीके से जीती हैं  ।इनकी फिल्में में नारी के विभिन्न सेड देखने को मिलते हैं ।"कमला की मौत "जैसे अपवादों के साथ जहाँ सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर केन्द्रित थी ।मुझे आज भी उनकी फिल्में देखना पसंद है जो कभी गुदगुदाती तो कभी भावों में बहा ले जाती हैं और कभी गूढ़ सन्देश देती है ।

प्रीती गुप्ता ✍

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