भारतीय परम्परा हाथ से खाना

भारतीय परम्परा हाथ से खाना

भारत में सालों से बहुत सारी परंपराएं प्रचलित है जिन्हें लोग भूलते जा रहे हैं इन परंपराओं में से एक है हाथ  से खाना खाना जिसे अब ज्यादातर लोगों ने चमकदार कटलरी के इस्तेमाल में बदल दिया है ।हाथ से  खाने वाले को लोग अब गवार का तमगा दे देते हैं। यह बात सही है कि चम्मच कांटे से खाना आज प्रचलन बन गया है।लेकिन मुझे लगता है "चाट चाट" कर खाने का मुहावरा यूं ही नहीं बना  हा हा हा हा हा.....

हम जब प्रसाद लेते हैं तो दोनों हाथ आगे बढ़ाते हैं, खुशियों की मिठाई भी अमूमन हाथ से ही उठाई जाती है। भारतीय परंपराओं में चम्‍मच या कांटे की बजाए हाथ से खाना खाने को बेहतर माना गया है। इसे स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्टि से भी अच्‍छा माना जाता है। पर क्‍या आप जानते हैं कि क्‍यों? कटलरी के इस्‍तेमाल की बजाए हाथ से खाना  ज्‍यादा बेहतर माना जाता है ?

हाथ से खाना खाने की हम भारतीयों की सदियों पुरानी परंपरा है। पुरातन समय से ही हमारे पूर्वज, ऋषि और महात्मा हमें हाथ से खाने की प्रेरणा देते आए हैं। लेकिन आज स्‍थितियां बदल रही हैं। हाथ से खाने के बजाय हमने चम्मच अथवा काटों के सहारे भोजन ग्रहण करना शुरू कर दिया।  

हाथ से खाना खानें में भोजन का अलग अहसास होता है। मगर इसमें सिर्फ स्वाद ही मुख्य कारक नहीं है। इसका एक तार्किक कारण भी है। जब हम चम्मच से खाना खाते हैं तो हमें खाने के तापमान का अंदाजा नहीं हो पाता, लेकिन यदि हम हाथ से खाना खाएंगे तो हमें इस तापमान का आसानी से अहसास रहेगा। यही नहीं जब हम हाथ से खाना खाएंगे तो स्‍वभाविक रूप से पहले उन्‍हें साफ करेंगे जबकि चम्‍मच का प्रयोग करने पर हम कई बार सफाई को इग्‍नोर कर देते हैं।

जानकार बताते हैं कि हम सब पांच तत्वों से बने हैं, जिन्हे जीवन ऊर्जा भी कहते हैं। ये पांचों तत्व हमारे हाथ में मौजूद हैं। इनमे से किसी भी एक तत्व का असंतुलन बीमारी का कारण बन सकता है। हाथ से खाना खाने से शरीर में निरोग रखने की क्षमता विकसित होती है। इसलिए जब हम खाना खाते हैं तो इन सारे तत्वों को एक जुट करते हैं, जिससे भोजन ज्यादा ऊर्जादायक बन जाता है और यह स्वास्थ्यप्रद बनकर हमारी उर्जा को संतुलित रखता है।आयुर्वेद भी कहता है कि हाथ से खाना  चाहिए और फिर रोटी तो हाथ से ही खाना संभव है ,छूरी  कांटे से नहीं।

हाथ से खाना खाने में केवल मजा ही नहीं आता  इसके  कुछ फायदे भी है जैसे-हाथ से भोजन करने पर संतुष्टि मिलती है और मन त्रप्त होता है।कटलरी के उपयोग से पेट तो भर जाता है पर वह संतुष्टि नहीं मिलती हाथ से खाना हमारी संस्कृति का हिस्सा है।हम विदेशी संस्कृति की देखा देखी उनकी तरह खाने बैठने और काम करने की नकल करते हैं। लेकिन हमें समझना चाहिए कि उनका खाना अलग तरह का होता है वे हमारी तरह रोटी, सब्जी नहीं खातेचावल दाल नहीं खाते जरा सोचिए यदि वह रोटी खाएंगे तो क्या कांटे छुरी से खाएंगे?

या दाल चावल खाएंगे  तो चॉपस्टिक से खाएंगे ?नहीं ना ...वैसे भी सबका अपना-अपना कल्चर होता है । जैसे हमारे यहां उपवास और वेस्टर्न कल्चर में डायटिंग ... ठीक भी है जो उन्हें सही लगता है वे करें और जो हमें सही लगता है हम करें।ना वो  भारतीय हो सकते हैं ना हम वेस्टर्न तो चाहे जैसे खाए दिखावा क्यों करना? मुझे तो ऐसा लगता है कि हाथ से खाने पर हम टेस्ट और सुगंध का ज्यादा मजा ले पाते हैं।
 

हां यह सही है कि हाथ से खाना खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह साफ कर लें और बाद में भी इन्हें धो लें।तो आप किसका इंतजार कर रहे हैं कभी-कभी चम्मच दूर कीजिए और हाथ से खाने का मजा लीजिए।


अनु गुप्ता

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