बिटिया के लिए बाबुल का आँगन है सावन

बिटिया के लिए बाबुल का आँगन है सावन

यूँ तो मायके की हर बात पर हर बेटी सावन हो जाती है। पर मायके की गली का सावन कभी भूल ही नहीं पाती। सावन के आते ही मन की रस्सियाँ पीहर के बागों में पींग डालती हैं। 
बाबुल के आंगन के लिये बिटिया का पीहर आगमन  है सावन
 हमारे लोकगीतों में भी बेटियों के मन की बात को कुछ यूँ कहा गया है 
गलियों री बीबी मनरा फिरे, अरे बीबी मनरा को लाओ बुलाय। जामैं चूड़ा तौ मेरी जान हाथी दांत का। बदरा मइके में जइयों जाके मइया से कहियो, याद करे तेरी लाडली।’’ 
सावन के इस गीत में उस विवाहिता के मन की वेदना है, जिसे ससुराल में अपने आंगन और बगीचे की याद सताती है। 

सावन के गीतों में विरह है तो उल्लास भी एक और लोक गीत जिसमें एक बेटी अपनी मां से ससुराल से उसे बुलाने के लिए कुछ यू कहती है. ...


.अम्मा मेरे बाबा को भेजो री – कि सावन आया
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री – कि सावन आया
अम्मा मेरे भाई को भेजो री – कि सावन आया
बेटी तेरा भाई तो बाला री – कि सावन आया
अम्मा मेरे मामू को भेजो री – कि सावन आया
बेटी तेरा मामू तो बांका री – कि सावन आया  
 यह गीत सभी विवाहित स्त्रियों के भीतर हलचल मचाता है। सावन आते ही वे अपने मायके आने के लिए अकुलाने लगती हैं। वे अपनी मां को संदेश भिजवाती हैं कि वह बाबा (पिता), भैया या चाचा किसी को भेजकर उन्हें घर बुला ले। दूर ब्याही बेटी को अपने घर-गांव की बहुत याद आती है। वह सोचती है, गांव में सावन के झूले पड़े होंगे, चारों ओर हरियाली छायी होगी और सारी सहेलियां मिलकर झूला झूल रही होंगी।

अब के बरस भेज भैय्या को बाबुल 
सावन में लीजो बुलाए रे
लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियां 
दीजो संदेशा भिजाए रे।
अम्बुवा तले फिर से झूले पड़ेंगे 
रिमझिम पड़ेंगी फुहारें
लौटेंगी फिर तेरे आंगन में बाबुल 
सावन की ठंडी बहारें
छलके नयन मोरा कसके रे जियरा 
बचपन की जब याद आए रे। ..
बैरन जवानी ने छीने खिलौने 
और मेरी गुड़िया चुराई
बाबुल थी मैं तेरे नाज़ों की पाली 
फिर क्यों हुई मैं पराई
बीते रे जुग कोई चिठिया न पाती 
ना कोई नैहर से आए रे। 

झूले पर झूलती अविवाहित कन्यायें अपने माता-पिता सगे सम्बन्धियों से आग्रह करती हैं कि उसका विवाह कहीं पास के गांव में किया जायेवे कहती है 

 - ‘‘कच्चे नीम की निबौरी, सावन जल्दी अइयो रे,

अम्मा दूर मत दीजौ, दादा नहीं बुलावेंगे। 
भाभी दूर मत दीजौ, भइया नहीं बुलावेंगे।’’

आज वक्त ने ऐसी करवट ली है कि सावन तो आता है पर अपने रंग नहीं बिखेर पाता। जिस सावन के आते ही नववधू ससुराल से मायके पहुंच जाती थी। बेटी के घर आने का इंतजार गली-मुहल्ले की औरतों के साथ मां किया करती थीं,अब वैसा सावन नही होता है ।

सावन की ढोलक की थाप भी ‘‘किटी-पार्टियों’’ की तालियों में गुम हो गयी है। फिल्मी गीतों पर मचलते मन ने कजरी को गुनगुनाना छोड़ दिया है। 

अनु गुप्ता

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