बॉलीवुड एक नजर में

दादा साहब फाल्के ने 1913 में भारत की पहली मूक फिल्म' हरिचंद' बनाई। उन्हें भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है, उनके नाम से प्रसिद्ध दादा साहब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा की गरिमा का एक नायाब रत्न है।

बॉलीवुड एक नजर में

हिंदी सिनेमा जो बॉलीवुड के नाम से जाना जाता है उसका यह नाम अंग्रेजी सिनेमा उद्योग हॉलीवुड की तर्ज पर रखा गया है।
मुंबई शहर में फलता फूलता यह उद्योग, विश्व में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला तथा सबसे ज्यादा फिल्में देने वाली इंडस्ट्री बन गया है।
दादा साहब फाल्के ने 1913 में भारत की पहली मूक फिल्म' हरिचंद' बनाई। उन्हें भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है, उनके नाम से प्रसिद्ध दादा साहब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा की गरिमा का एक नायाब रत्न है।
1920 के दशक में महाभारत और रामायण जैसी पौराणिक व ऐतिहासिक तत्वों के आधार की फिल्मों का बोलबाला रहा। 1930 इस फ़िल्म उद्योग हर साल 200 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण होने लगा। इस तरह भारतीय सिनेमा के पौधे का विकास आरंभ हो गया।
भारत की पहली बोलने वाली फिल्म  ईरानी  द्वारा निर्मित "आलम आरा" रही।
इस फिल्म ने टॉकीज की शुरुआत कर दी।
1930 से 1940 के दौरान कई प्रख्यात फिल्म हस्तियां जैसे  देवकी बोस, चेतन आनंद, एसएस वासन आदि कलाकारों ने फिल्म उद्योग को अपना योगदान दिया।
1930 से 1940 के दशक में द्वितीय विश्व युद्ध तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कारण ज्यादा फिल्में नहीं बनी।
आलम आरा फिल्म के बाद निर्माता ईरानी ने 1937 में पहली रंगीन फिल्म "किशन कन्हैया" बनाएं। इस प्रकार हिंदी सिनेमा को एक नया स्वरूप प्रदान किया गया।
भारत की आजादी से पहले के दशक 1940 से आजादी के बाद के दशक 1960 तक को हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम युग माना जाता है।
इस दौरान में सबसे शानदार फिल्म जैसे प्यासा ( 1951), कागज के फूल ( 1959), आवारा ( 1951), श्री 420 ( 1950)  और आन ( 1952 ) फिल्में बनी, इन फिल्मों में भारत के सामाजिक मुद्दों को सिनेमा के पदों में उभारा गया।
1947 के आसपास मूल रूप से आधुनिक भारतीय फिल्म उद्योग का जन्म हुआ, श्रेष्ठ निर्माता  सत्यजीत रे, विमल राय ने कई सामाजिक कुरीतियां पर कई फिल्म बनाई, यह फ़िल्में  दहेज ,वेश्यावृत्ति, बहु विवाह, जात -पात आदि विषयों पर आधारित रही।
1957 में बनी महमूद खान की फिल्म "मदर इंडिया "ने पूरे विश्व में हिंदी सिनेमा के  परचम लहराए।
विमल राय ने 1958 में मधुवती बनाई जो कि पुनर्जन्म में आधारित रही और दर्शकों ने इसे बहुत पसंद किया।
1950 में बंगाली सिनेमा भी फिल्म जगत में उतर आया, 'नीचा घर' तथा 'दो बीघा' जमीन उस समय की बहुत प्रसिद्ध फिल्मों में से एक रही, “ नीचा घर” को Cannes film festival में पुरस्कृत किया गया।
गुरुदत्त को उस समय का सबसे मशहूर फिल्म निर्माता माने जाते हैं, देव आनंद, राज कपूर , दिलीप कुमार , गुरुदत्त, मीना कुमारी , नूतन , वैजयंती माला , वहीदा रहमान , मधुबाला आदि उस समय के मशहूर कलाकार माने जाते हैं। इन कलाकारों का हिंदी सिनेमा के विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
1960 में बनी मुग़ल-ए-आज़म का भी हिंदी सिनेमा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसे दोबारा रंगीन करके सिनेमाघरों में दिखाया गया।
इस समय हिंदी सिनेमा में रोमांटिक और एक्शन फिल्मों का दौर शुरू हो गया मशहूर कलाकारों में राजेश खन्ना, शशि कपूर ,रजनीकांत, शर्मिला टैगोर ,आशा पारेख, मुमताज आदि का नाम आता है।
1970 के दशक में मसाला फिल्मों के जनक माने जाने वाले मनमोहन देसाई की कई फिल्में आई। इस दशक में अमिताभ बच्चन ,मिथुन चक्रवर्ती जैसे अभिनेताओं ने फिल्मों में डाकुओं के नए दौर को जन्म दिया , रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित फिल्म 'शोले 'ने ना केवल भारत में बल्कि अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर भी काफी प्रसिद्धि प्राप्त की।
1980 के दशक में कई महिलाएं निर्देशक जैसे मीरा नायर ,अपर्णा सेन अन्य लोगों ने भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। 1981 में बनी फिल्म "उमराव जान "में रेखा का असाधारण व शानदार अभिनय आज तक लोगों के दिलों में जिंदा है।
1990 के दशक में अनिल कपूर से लेकर सलमान खान, शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित, जूही चावला, चिरंजीवी, श्रीदेवी जैसे अन्य कलाकारों के साथ नई तकनीकी का इस्तेमाल ने भारतीय सिनेमा को उसके चरम तक पहुंचा दिया।
आज के दशक में दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह, रणबीर कपूर ,आलिया भट्ट जैसे कई नए कलाकारों ने फिल्म इंडस्ट्री को फलता -फूलता उद्योग बना दिया है, हर साल कई फिल्में बनती हैं जो 100 करोड़, 200 करोड़ के क्लब में शामिल होती हैं और  बॉलीवुड हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है। बॉलीवुड गानों की बिना भारतीयों की शादी अधूरी लगती है। बॉलीवुड तड़का हमारी रोजमर्रा की थकावट में कुछ पल सुकून के देता है।
#बॉलीवुड तड़का

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