बोउदी

बोउदी

 बोउदी... हाँ ,मैंं उन्हें इसी नाम से पुकारती थी ... वो सही मायने में मेरी बोउदी मतलब भाभी थी....मेरी हमजोली ,मेरी सच्ची दोस्त। मैं उन्हें अपनी प्रेरणा मानती हूँ क्योंकि आज मैंं जिस मक़ाम पर हूँ, वहाँ तक पहुँँचाने में उनका बड़ा हाथ है। वरना मेरे जैैैसी 

खिलाड़ी लड़की अपने सपनों के राजकुमार की प्रतीक्षा और शादी के अलावा और कुछ नहीं सोचती थी। मेरे जीवन के रचनात्मक वर्ष यानी किशोरावस्था उनके सान्निध्य में बीता और हर क्षण हर पल मैं उनसे प्रभावित होती रहती चाहे वो उनका हुनर हो , रंगरूप हो या आचार विचार हो। सही मायने में पूरी तरह उनके सम्मोहन में थी मैं। 
बोउदी का नाम दूर्बा था और वो हमारे मोहल्ले के चटर्जी अंकल की बहू यानी आशीष भैया की पत्नी थी। मुश्किल से 21-22 की रही होगी बोउदी जब वो इस घर में बहू बनकर आई थीं और आते ही जैसे सबका दिल जीत लिया। और उस 'सबका' में चटर्जी अंकल और मैं यानी रावी सबसे पहले नंबर पर थे। हालांकि मैं उनके घर की सदस्या नहीं थी लेकिन अंकल आंटी मुझे अपनी बेटी मानते थे।
पहले तो कभी कभी उनके घर जाती थी ,पर बोउदी के आने के बाद मैं हमेशा वहीं मिलती। आशीष भैया सेंट्रल गवर्नमेंट की नौकरी में दिल्ली में पोस्टेड थे। अपने इकलौते बेटे के लिए पटना में बसे चटर्जी अंकल आंटी ने खासतौर पर कोलकाता के अपने संबंधियों से कहकर बोउदी के साथ पूरी छानबीन के बाद रिश्ता तय करवाया था। खूब प्यारी गुलथुल सी ,मध्यम कद की सुंदर बंंगाली बाला जिसने आते के साथ उस घर को गुलजार कर दिया था। जितना मीठा स्वभाव उतनी ही मीठी बोली । अपने रविंंद्र संगीत से सास सुुसर का दिल जीत लिया था। शुरू शुरू में जब मैं उन्हें भाभी बुलाती तो वह उसे सुधार कर 'बोउदी ' बोलने को कहती। उसके बाद तो वो सबकी बोउदी हो गई। 
शादी के बाद भैया भाभी दोनों दिल्ली चले गए । दुर्गा पूजा के समय छुट्टी लेकर दोनों पहली बार पटना आए थे। मैंने तो जैसे खबर सुनी ,धमक गई बोउदी से मिलने। पर इस बार उनके चेहरे पर वो चमक नहीं थी , बुझी बुझी सी दिखी वों। बाद में भैया चले गए और वो यहीं रुक गई अंकल आंटी के पास। 
 
चार छह महीने बीत गए बोउदी को यहाँ आए हुए ,मोहल्ले में कानाफूसी होने लगी। आपके अड़ोसी पड़ोसी और कोई मदद करें या ना करें ,थोड़ी भी ऐसी वैसी स्थिति की भनक लगी नहीं कि पहुँच जाएँगे आपकी खोज खबर लेने। माँ ने भी मेरे द्वारा टोह लेने की कोशिश की ,परन्तु मैंने साफ कह दिया कि मैं कोई खुफिया जासूस नहीं हूँ ,सब बढ़िया है चटर्जी अंकल के घर। प्रतिदिन शाम संगीत की बैठक सजती है , दिन में ताश का दौर चलता और बाकी समय कुछ न कुछ बनाती या सीखती हैं बोउदी अपनी सासु माँ से। बुजुर्ग दंपत्ति प्यारी सी बहू को पाकर निहाल हैं। 
 
ये तो थी सतही खबर ,पर आंतरिक बात थी कि आजकल बोउदी पढ़ाई लिखाई में भी व्यस्त रहती थीं। अंकल आंटी उनका हरसंभव ख्याल रखते और उन्हें जिस चीज की जरुरत होती क्षणभर में उनके सामने हाजिर कर देते। सालभर के अंतराल में भैया  और बोउदी के माँ बाबा  एकाध बार दो-तीन दिनों के लिए आए थे लेकिन बोउदी यहीं डटी हुई थी पटना में। अचानक एक दिन खबर मिली भाभी का बैंक पी.ओ में सेलेक्शन हो गया। मुझे तो इसका अंदाज़ा था ,पर इतनी जल्दी ये सफलता मिल जाएगी यकीन नहीं था। बेहद घरेलू सी दिखने वाली मेरी बोउदी ने कमाल कर दिया था। 
उस दिन शाम को चटर्जी अंकल ने घर पर पार्टी रखी थी बोउदी की सफलता को सेलीब्रेट करने के लिए। सफलता की खुशी के साथ-साथ मेहमानों में कानाफूसी भी हो रही थी आशीष भैया की भूमिका को लेकर। पर अंकल आंटी ने बड़ी चतुराई से भैया के जिक्र को दबाते हुए बोउदी के ज्वाइनिंग और ट्रेनिंग के बारे में सबकुछ बताना शुरू कर दिया, सबके मुँह पर ताला पड़ गया....."हमें क्या ,जो भी करें।" सच में ,किसी और को क्या मतलब था ,सभी आए खाए पीए और चलते बने।
कुछ दिन बाद बोउदी ट्रेनिंग के लिए चली गई और फिर उनकी पोस्टिंग पटना के पास के एक कस्बे में हो गई। अब बोउदी यहीं रहती और बैंक करती। इसी दौरान मेरा ग्रैजुएशन हो गया था और मैंने एम.एस.सी.में एडमिशन ले लिया था जो कि सिर्फ टाइम पास था मेरे लिए, जब तक शादी तय नहीं होती तब तक का शगल। मेरे उद्देश्यहीन जीवन वाले फंडा से बोउदी को बहुत परेशानी होती। वो मुझे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उकसाती और मैं हँसकर टाल जाती। तब एक दिन बोउदी ने अपना दिल खोलकर रख दिया मेरे सामने। 
" देख रावी, जैसा तू सोच रही है जीवन फूलों की सेज नहीं है। सिर्फ शादी और पति यहीं जीवन नहीं है। तुम्हें अपने लिए कुछ जरूर करना चाहिए। ईश्वर करे तुम बहुत सुखी रहो लेकिन अगर खुद की एक पहचान बना सको तो हर्ज क्या है ! शादी के बाद मैं सबकी प्रिय बन गई लेकिन जिसकी प्रिया बनकर आई थी ,उसके साथ दूरी थी। तेरे भैया को मेरा अल्हड़ मस्त व्यवहार मेरी फूहड़पन लगती । मेरा साधारण बांग्ला मीडियम से ग्रैजुएट होना भी उन्हें अखर गया था लेकिन माँ बाबा के सामने जबान खोलने की हिम्मत नहीं पड़ी और चुपचाप लगन मंडप में बैठ गए।
काश , उस समय बहादुरी दिखाई होती तो आज दो जिंदगी यूँ दाव पर न होती। नई नवेली मैं, जब दिल्ली गई मेरी आँखों में अनगिनत सुनहरे सपने थे। पर मैं तुम्हारे भैया की आशाओं के अनुरूप नहीं थी। हमारी दूरी बढ़ती जा रही थी। कहने को पति पत्नी थे ,पर एक छत के नीचे अजनबी की तरह रहते थे। मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गए और तब मैंने ठान लिया कि अब कुछ बनकर दिखाऊँगी। पटना आकर मैंने घर में मायके वापस जाने की बात कही। पर माँ बाबा की अनुभवी नजर ने मेरी अनकही बातों को समझ लिया। दरअसल मैं खुद वापस मायके जाकर उनलोगों की परेशानी बढ़ाना नहीं चाहती थी । इसलिए जब बाबा ने कहा ,अब तुम हमारी जिम्मेदारी हो और हम तुम्हारे साथ हैं ना कि उस नालायक के। तो मुझे बहुत हिम्मत मिली।
मैंने बैंकिंग सर्विसेज में जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की क्योंकि शादी के समय मैं उसकी तैयारी कर रही थी। लेकिन इतना अच्छा घर वर देखकर मेरे घरवालों ने मेरी एक न सुनी और मैं आशीष के पल्लू बाँध दी गई। वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि मुझे माँ बाबा जैसे इतने सपोर्टिंग सास ससुर मिले जिन्होंने मुझे बहू नहीं बेटी मानकर मेरे अहम का मान रखा और मुझे एक नई पहचान दिलाई। वरना सारी उम्र मैं आशीष के रहमोकरम तले पड़ी रहती । अब यहाँ रहती हूं पर पूरे स्वाभिमान के साथ। अब बोलो ...क्या सोचा है तुमने ?"
बोउदी की बातों ने मेरे ऊपर जादू सा असर किया। ना सिर्फ मैंने गोल्ड मेडल के साथ पोस्ट ग्रैजुएशन किया बल्कि नेट की परीक्षा भी पास कर ली। आजकल एक कॉलेज में लेक्चरर की पद पर कार्यरत हूँ और अपनी खुशहाल शादीशुदा जिंदगी में मस्त और व्यस्त हूँ। 
 हाँ , एक और अच्छी बात .....आशीष भैया ने बोउदी से माफी मांग ली। काफी नानुकुर के बाद बोउदी ने उनका प्रस्ताव स्वीकार किया और आज दोनों की गृहस्थी खूब मजे में चल रही है एक नन्हा मुन्ना भी आ गया है। बोउदी ने भी दिल्ली ट्रांसफर ले लिया है और पूरा चटर्जी परिवार आजकल दिल्ली शिफ्ट हो गया है और मजे में है।
 
तिन्नी श्रीवास्तव ।
 
 

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