बुलबुल फिल्म (समाज में व्याप्त नारी के प्रति नजरिया)

बुलबुल फिल्म (समाज में व्याप्त नारी के प्रति नजरिया)

किसी भी हाॅरर फिल्म में सबसे ज्यादा डरावना हिस्सा उसके डरावने किरदार भूत-प्रेत ,चुड़ैल,आत्मा आदि ही होते हैं। लेकिन किसी हाॅरर फिल्म में समाज एक हाॅरर किरदार के रूप में उभर कर सामने आए तो यकिनन वो फिल्म हमारे समाज का आईना ही होती है। बुलबुल उसी प्रकार की फिल्म है।
            कहानी की प्लाट 1881के बंगाल ‌की है।उस बंगाल की जो अपने काला जादू और जमींदारी प्रथा के लिए मशहूर था। ये वो दौर था जब छोटी-छोटी बच्चियों की शादी उनके उम्र से तिगुने चौगुने पुरुषों से कर दी जाती थी। लड़कियों को बिछिया उनके काबू में रखने के लिए पहनाया जाता था।  फिल्म में बुलबुल और उसकी बुआ के कथनोपकथन से इसे बताया जाता है। बुलबुल का ये कहना कि "बिछिया क्यों पहनते हैं" इसके जबाब में बुआ का ये बतलना कि "ताकि वे उड़ ना सके"। ये संवाद उस दौर में स्त्रियों की दिशा और दशा दोनों को ही इंगित करता हैं।
         बुलबुल फिल्म में अन्विता दत्त का निर्देशन ही इस फिल्म की खासियत है। निर्देशिका ने कहानी को एक सुपर नेचुरल थ्रिलर के अंदाज में कहा है।
     बंगाली जमींदारों की बड़ी - बड़ी हवेलियां ,उस दौर के घने जंगल, धोती - कुर्ता में बंगाली पुरुष , साड़ी गहने माथे पे बड़ी बिंदी और पैरों में आलता लगाए हुए बंगाली बहु , पालकी उठाने वाले, उस दौर की घोड़ा गाड़ी, सफेद साड़ी में लिपटी बिना बालों की विधवाएं ये सब फिल्म के दृश्य हमें उस कालखंड में ले जाती है।
      फिल्म में कुछ सीन बेहतरीन फिल्माए गए हैं। जैसे फिल्म में  दुल्हन बनी बुलबुल जब अपनी बुआ से पुछती है कि बिछुए क्यों पहनते हैं तो उसकी बुआ बोलती है ताकि लड़कियां उड़ न सके।
एक और सीन है जिसमें राजा रवि वर्मा की पेंटिंग का हिंसक दृश्य दिखलाने के बाद  बड़े ठाकुर द्वारा बुलबुल की पिटाई का हिंसक दृश्य फिल्माया गया है ।जो औरतों पे होने वाले अत्याचार को बखूबी परिभाषित करता है।इसी तरह एक और सीन है जब बुलबुल के बलात्कार के उपरान्त उसे चुप रहने ‌को बोलती है और साथ में अपना उदाहरण देते हुए अपना दर्द भी व्यक्त करती है। और कहती है बड़ी बड़ी हवेलियों में ऐसे कितने ही राज दफन रहते हैं ।चुप रहना किसी से ना कहना।
           निर्देशिका ने अपनी बात को कहने के लिए लाल रंग का उपयोग बहुत ही किया है। यहां लाल रंग शक्ति का भी प्रतिक है और साथ ही खून के रंग का भी। रात में होने वाली धुंध और साथ में चांद को भी लाल ही दिखाया गया है।
     तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत है। बैकग्राउंड म्यूजिक लाउड नहीं है। ख़ामोशी तथा प्राकृतिक आवाजों को भी उतना ही महत्व दिया है। सिनेमाटोग्राफी ,सेट, लोकेशन्स और कास्ट्यूम सब अच्छा है।
              बुलबुल के लीड रोल में तृप्ति डिमरी ने भूमिका निभाई है । उन्होंने अपने अभिनय से एक रहस्यमय वातावरण को निर्मित किया है। उनकी बड़ी-बड़ी आंखें बहुत कुछ बोलती है। उनके संवाद बोलने का तरीका भी एक अमिट छाप छोड़ती है।एक नारी के प्रेम ,दर्द ,प्रताड़ना खुशी ,गम आदि सभी भावनाओं के संघर्ष और उसकी सोच को अपने अभिनय से बेहतरीन तरीके से दिखाया है। बुलबुल के किरदार को तृप्ति डिमरी ने बखूबी परिभाषित किया है।
        बुलबुल के किरदार के बाद एक और महिला किरदार जो छोटी बहू है उस रोल को पर्दे पर उभारा है पाओली दाम ने । उन्होंने उम्र में बड़ी  छोटी बहू का किरदार बखूबी निभाया है जो छोटी उम्र की बड़ी बहू पर अपना रौब  दिखाती  है । वह उम्र में छोटी बड़ी बहू को आंखें दिखाती है । पाओली दाम ने छोटी बहू के किरदार जीवंत कर दिया है। बुलबुल के किरदार के बाद छोटी बहू विनोदिनी का किरदार फिल्म में बहुत महत्त्वपूर्ण है। बड़े ठाकुर के साथ उसका अनैतिक संबंध, बुलबुल का अपने देवर सत्या में ज्यादा ही आकर्षण है इसका खुलासा बड़े ठाकुर से  छोटी बहू  विनोदिनी  ही करती है।  बुलबुल के बलात्कार के उपरान्त अपने दर्द को बताते हुए उसे चुप रहने को कहती हैं।उसका ये कहना कि बड़ी बड़ी हवेलियों में ऐसे बड़े राज छिपे ही रहते हैं इसलिए चुप रहना कुछ न कहना बहुत कुछ बयां कर देता है।
          बड़े ठाकुर और उसके पागल जुड़वां भाई महेन्द्र के रोल में राहुल बोस एकदम से फिट बैठते हैं। उन्होंने अपने अभिनय से दोनों ही किरदारों के प्रति न्याय किया है। बड़े ठाकुर का रौब , क्रोध, ईर्ष्या सब निभाते ही है साथ ही महेंद्र ठाकुर के रोल में पागलपन, स्त्री लोलुपता सनकी आदि को भी उभारते है।
        अविनाश तिवारी ने देवर सत्या का रोल किया है। उनका अभिनय भी कमाल का है। जमींदारो का रोब भी उनके अभिनय में दिखता है।उस समय के लंदन रिटर्न  बैरिस्टर बाबू की ही तरह अभिनय निभाने की कोशिश की है।उन्होने बंगला टोन और बाॅडी लैंग्वेज का भी ख्याल रखा है।
        एक छोटे से डाक्टर के रोल में परमब्रत चटर्जी नजर आए हैं । उन्हें समय कम मिला पर उतने ही समय उन्होंने अपने अभिनय की छाप छोड़ी है।
  अंत में यही की कहानी में कोई नयापन नहीं है फिर भी अन्विता दत्ता के निर्देशन और कलाकारों का अभिनय इसे एक बार देखने लायक बनाता है। फिल्म की समय अवधि ड़ेढ घण्टा ही है। जिससे यह ऊबाऊ नहीं लगती है।

      #दपिंकाॅमरेड

      #वर्षगांठ

      #वाॅलीबुडतड़का    
    

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