चंद्रशेखर से चंद्रशेखर आजाद बनने तक का सफर

चंद्रशेखर से चंद्रशेखर आजाद बनने तक का सफर

आज हम जिस आजाद भारत में जी रहे हैं वह कई देशभक्तों की देशभक्ति और त्याग की वेदी से सजी हुई है. भारत आज जहां भ्रष्टाचारियों से भरा हुआ नजर आता है वहीं एक समय ऐसा भी था जब देश का बच्चा-बच्चा देशभक्ति के गाने गाता था. भारत में ऐसे भी काफी देशभक्त तो ऐसे थे, जिन्होंने छोटी सी उम्र में ही देश के लिए अतुलनीय त्याग और बलिदान देकर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करवाया. इन्हीं महान देशभक्तों में से एक थे चन्द्रशेखरआजाद।

हमारे देश को आजादी दिलाने के लिए कई जवानों ने बलिदान दिया। भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, राम प्रसाद बिस्मिल जैसे कई क्रांति कारियों ने अपने इस देश को गुलामी की जंजीरों से आजादी दिलाने के लिए अपने प्राणों की कुर्बानी दी। इनके द्वारा बोले गए देशभक्ती के नारे आज भी हर देशवासियों में देशभक्ति का जज्बा जगाते है।

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को हुआ था. उनका जन्म स्थान मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले का भाबरा में हुआ था. देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वाले क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद जब पहली बार अंग्रेजों की कैद में आए तो उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई थी।

जलियांवाला बाग कांड के बाद सारे बड़े क्रांतिकारी प्रोटेस्ट पर उतर आए थे. चंद्रशेखर ऐसे ही किसी प्रोटेस्ट का हिस्सा बने थे. जिसमें अंग्रेजों ने उन्हें अरेस्ट कर लिया. उस वक्त वो केवल 16 साल के थे. पकड़े गए तो कोर्ट में पेशी हुई. मजिस्ट्रेट ने जब नाम, पता, औऱ बाप का नाम पूछा तो चंद्रशेखर ने जवाब में कहा कि, मेरा नाम आज़ाद है, पिता का नाम स्वतंत्र और पता जेल है. चंद्रशेखर के इस जवाब को सुनकर मजिस्ट्रेट चौंक गया. उसने चंद्रशेखर को 15 दिनों तक जेल में रहने की सजा सुनाई. जेल में उन्हें अंग्रेजों ने बहुत पीटा. हर मार के बाद वो और सख्त होते गए. जेल से बाहर निकलते ही लोगों ने आज़ाद का स्वागत फूल और मालाओं से किया. अखबार में उनकी फोटो छपी  इसके बाद से लोग उन्हें आज़ाद के नाम से जानने लगे।

चंद्रशेखर आजाद कहते थे कि 'दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे'. एक वक्त था जब उनके इस नारे को हर युवा रोज दोहराता था. वो जिस शान से मंच से बोलते थे, हजारों युवा उनके साथ जान लुटाने को तैयार हो जाते थे।

27फ़रवरी, 1931 का वह दिन भी आया जब इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में देश के सबसे बड़े क्रांतिकारी को मार दिया गया. 27 फ़रवरी, 1931 के दिन चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे कि तभी वहां अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया. चन्द्रशेखर आजाद ने सुखदेव को तो भगा दिया पर खुद अंग्रेजों का अकेले ही सामना करते रहे ,अंत में जब अंग्रेजों की एक गोली उनकी जांघ में लगी तो अपनी बंदूक में बची एक गोली को उन्होंने खुद ही मार ली और अंग्रेजों के हाथों मरने की बजाय खुद ही आत्महत्या कर ली।

 कहते हैं मौत के बाद अंग्रेजी अफसर और पुलिसवाले चन्द्रशेखर आजाद की लाश के पास जाने से भी डर रहे थे ।

ऐसे थे चंद्रशेखर आजाद जिन्होंने कहा कि आजाद जिया हूं,आजाद मरूंगा और अपनी बात को  सच कर दिखाया।

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