छूना न ,छूना न अब तुम बड़ी हो गईं

छूना न ,छूना न अब तुम बड़ी हो गईं

छूना न छूना न छूना न,,,,,छूना न अब तुम बड़ी हो गईं। ये  धुन सुनते ही मशहूर अभिनेत्री की सुपर हिट फिल्म डर्टी का गाना हमारे सामने घूम जाता है पर मैं ये लाइनेअक्सर सुनती थी जब मैं "उन दिनों" से गुजर रही होती थी।तो सांझा कर रही हूँ आप सबके साथ उन खट्टी मीठी यादों को एक संदेश के साथ।

बात उन दिनों की है जब मैं भी बच्ची से थोड़ी बड़ी बच्ची हो गई थी।बड़ा परिवार था ।दादी ,दो चाचियाँ,बुआ,दादी बुआ और मुझसे छोटी मेरी कजिन को मिलाकर हम छः बहनें। घर में पूजापाठ बहुत होती थी और नियमों का पालन भी।उन दिनो पीरियडस से होने पर हमारे यहाँ तीन दिन तक रसोई नही छूते थे।चौथे दिन सर से नहाकर ही मम्मी चाचियां रसोई बनाती थीं।चूंकि बड़ा परिवार था तो सारे नियम अच्छे से निभ भी जाते थे ,और मम्मियों के हिसाब से पूरे महीने  काम करते करते उन्हे रसोई से तीन दिन की  छुट्टी भी मिल जाती थी जिसका वो सब इंतजार भी करती थीं।
पर अब जब मैं उस दौर से गुजरने लगी थी तो आदतनवश "उन दिनों"  में पानी लेना हो तो मैं फटाक से रसोई में और खाना लेना हो तो मैं रसोई के अन्दर और ऐसा मैं जानबूझ कर नही करती थी दरअसल मुझे महसूस ही नही होता था कि मैं पीरियड से हूँ।
न कोई पेट दर्द न पैरों में।जिस दिन होती थी उस दिन सब याद और शाम होते होते भूल जाती थी और चली जाती थी मम्मी चाची से खाना,नाश्ता लेने और जहाँ मेरे कदम रसोई की दहली पार करें वहीं मेरी दादी बुआ का चिल्लाना शुरू-छूना न....छूना न....अरे, अब तुम बड़ी हो गईं !
हा हा हा और सच बताऊँ ऐसा कई बार हुआ। जब मैं रसोई में जाऊँ तो जो रसोई मे हो मुझसे कहे -तुम तो छुट्टी से हो न और खुदा न खास्ता अगर धोखे से मैं अचार पापड़ कुछ छू लूँ तो फिर किसी न किसी बड़े की तर्राती सी आवाज-अरे छूना न छूना न  ....कितनी बार समझायें !! अब तुम बड़ी हो गई हो ,ध्यान रक्खा करो।ठाकुर जी हैं घर में और हमारे यहाँ परहेज करते हैं।तब से मुझे दो नये शब्द याद हुए  पीरियडस के मामले में छुट्टी और परहेज।
ऐसे ही एक बार मैं अपनी फ्रैंड के घर गई।एजुकेटेड फैमिली।अंकल बॉयो के लेक्चरार और उस समय मेरे फ्रैंड सर्कल में उसी फ्रैंड के फॉदर जॉब में थे बाकि मोस्टली सब बिजनैस मैन और लगभग सभी की एक सी विचारधारा। उसके घर गई तो देखा अंकल और भैया खाना बना रहे थे ।मेरी सहेली मेरी हमउम्र थी और अपने भाई से काफी  छोटी। अंकल जी को रसोई में काम करते देखा तो चिंता और आश्चर्य से पूँछा -आंटी जी कहां है....उनकी तबियत ठीक है न ! वह बोली-चुप।सब ठीक हैं ,मम्मी पीरियड से हैं न तो इसलिये। अभी  अभी सोने गईं हैं।वैसे भी दो तीन दिन मम्मा रेस्ट ही करती हैं।
रसोई में भी काम नही करतीं बस हल्का फुल्का काम जैसे सब्जी वगैरह काट देती हैं बस।अच्छा  ! तो तेरे यहां भी मानते हैं ये सब।मुझे तो लगता था कि मेरा परिवार ही रूढवादी है ,ये फालतू की बातें,इन दिनों मे ये मत करो वो मत करो ।अब जिसके घर में कोई न हो वो क्या करे,,,,,,! 
मैं अपना गुबार निकाल रही थी तब वह बोली अरे यार बॉडी भी तो रेस्ट मांगती है न,तू देखती है न मैं तो स्कूल तक नही आती।तभी अंकल जी चाय नाश्ता लेकर आये शायद उन्होने हमारी बातें सुन लीं थीं बोले-  मैं बताता हूँ काम क्यों नही करते।  फिजीकली लेडीज, मेनस्ट्राल की वजह से वीकनैस फील  करती हैं।अपनी अपनी बॉडी के हिसाब से किसी को स्टमकपेन रहता है और किसी को इरीटेशन।
इसलिये  पुराने  समय से ही हमारे सनातन धर्म में  मेनस्ट्राल के समय स्त्रियों का रसोई में जाना, पूजा पाठ में बैठना वर्जित माना गया है।कम से कम मैं तो इन  रोक टोक को इसी रूप में देखता हूँ। स्त्रियों का अधिकांश समय रसोई मे ही निकलता है तो तीन दिन उनको आराम भी मिल जाता है और परिवार के सदस्यों को भी  पता होता है कि ये अब ये काम नही करेंगी तो उनको भी आदत हो जाती है इन दिनों में रसोई संभालने की।अंकल जी  तेजी से हँसे थे और मैं बहुत आश्चर्य चकित थी।
मेरे घर से मेरी सहेली के घर का एटमास्फियर एक दम अलग था। हमारे घर तो पापा के सामने टीवी में आ रहे विशपर के एड की आवाज भी कम कर दी जाती थी और अंकल जी ने विज्ञान और  धार्मिक मान्यताओं का निचोड़ स्त्री के शारीरिक और मानसिक आराम से लगाया था।
आज मुझे अपनी मम्मा की वो तीन दिन की छुट्टी बहुत याद आती है जब  न्यूक्लियर  फैमिली होने लगी हैं और आपको बॉडीपेन, इरीटेशन के बावजूद भी अपने काम खुद करने पड़ते हैं।क्योंकि हम रूढवादी नही हैं और हम इन सब बातों को नही मानते।
सखियों मेरा ब्लॉग मेरी विचारधारा है ।मुझे ऐसा लगता है कि वाकई  लेडीज को पीरियडस मे आराम की जरूरत होती है ।तो दादी और माँ ,चाची का छूना न,,,छूना न  बिल्कुल सही था काश कि हर परिवार में वह तीन दिन स्त्रियों के आराम के हों और हर पति को उन दिनों मे रसोई संभालने की आदत हो।आपकी क्या राय है।
#MyFirstPeriod
पढ़ने के लिये  धन्यवाद
सारिका रस्तोगी

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