थोथा लाड़ बंदरिया का, सांचौ लाड़ चिरैया का

थोथा लाड़ बंदरिया का, सांचौ लाड़ चिरैया का

अम्मा रामसखी की दो बहुएं थीं। बड़ी बहू का नाम सरोज और छोटी का नाम कमला था। दोनों बहुएं एक साथ ही गर्भवती हुईं। यह सोच -सोच अम्मा रामसखी का बुरा हाल था कि एक साथ दोनों बहुओं की सोवढ़ का काम कैसे निपटाएंगी।
घर का अब एक काम तो होता नहीं ,हजार काम होते हैं। यह बात अम्मा को तब समझ आई ,जब नौवें महीने में ही दोनों बहुओं को दाई ने आराम करने को बोल दिया ।क्योंकि बच्चा नीचे की ओर सरक रहा था ।अगर बच्चा समय से पहले हो जाए ,तो पूरी तरह स्वस्थ और हष्ट पुष्ट नहीं होता ।
यह सुन अम्मा ने दोनों बहुओं को सख्त हिदायत दी कि कोई भी काम करने की आवश्यकता नहीं। तुम दोनों सिर्फ आराम करो ।यह सुन दोनों बहुओं को बड़ी खुशी हुई कि हमारी सासू मां को हमारी कितनी चिंता है।
अम्मा रामसखी की कमर तो अभी से ही टेढ़ी पड़ती जा रही थी। काम का बोझ जो उन पर पड़ गया था ।
खैर .....सही समय पर दोनों बहुओं ने सुंदर बेटों को जन्म दिया। अब रोज ही कोई ना कोई पड़ोसन पोतों का मुंह देखने के लिए आती रहती ।
अब अम्मा घर का काम करें या उनकी आवभगत करें।सो अम्मा ने थोड़ा काम बहुओं से कराने की सोची। अब तो वंश का चिराग पैदा हो ही चुका था। इससे पहले तो अम्मा की ममता बहुओं पर शहद की तरह टपक रही थी ।अरे बेटा, तुम ना करो। यह बुढ़िया कर लेगी सब। इस बुढ़िया का क्या बुढ़ापे में अचार डालेगा?
तुम दोनों आराम करो । परंतु पोतो का मुंह देखते ही अम्मा के सर से बहुओं पर होने वाले लाड़ का भूत छूमंतर हो गया।
क्योंकि कभी वह बहुओं को दाल बीनने को दे देती, तो कभी मसाले ।कभी कहती कपड़े तह कर दो, तो कभी-कभी कंडे थाप दो। अम्मा का बस चले तो बहुओं से रोटी भी बनवा ले।और तो और साथ में यह भी कहती, कोई तुम्हें पड़ोसी काम करती देख ले ,तो फौरन अपनी चारपाई पर लेट जाना ।
तभी अचानक अम्मा की एक सहेली इलायची आ जाती है ।हाय दैया .....रामसखी ,बहुओं से इस हाल में इतना काम? अरे! इलायची, यह मानती ही नहीं हैं। कहती हैं- पड़े -पड़े मन नहीं लगता ।तब बड़ी बहू सरोज इलायची अम्मा के जाते ही बोली -अम्मा आपका लाड़ तो ऐसा है, जैसे थोथा लाड़ बंदरिया का, सांचौ लाड़ चिरैया का। अरे यह क्या बोले जा रही है ?बकर -बकर। वैसे तो अम्मा रामसखी के सामने किसी की भी हिम्मत ना थी, कुछ भी बोलने की।
पर बड़ी बहू ने बड़ा साहस जुटाकर दिल की बात बोल ही दी। अम्मा! मैं यह कहना चाहती हूं कि आप हमसे दिखावटी प्यार करती हैं, बंदरिया की तरह। सच्चा लाड़ तो एक चिड़िया ही अपने बच्चों से करती है, जो आप हमें कभी नहीं दे पाएंगीं। चिड़िया ही है ,जो अपने बच्चों को मुंह में दाना देती है ।आपने तो अपना स्वार्थ सिद्ध होते ही हमें बंदरिया जैसा रूप दिखा दिया ।चिड़िया जब तक, उसके बच्चे उड़ना नहीं सीख जाते, तब तक उन्हें भोजन उनकी चोंच में ही देती है ।आप कम से कम हमारी सोवढ़ का एक माह तो बीत जाने देती।

पारुल हर्ष बंसल

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