क्या मारपीट ही घरेलू हिँसा है ?

अगर हमें औरतों के खिलाफ हुए शोषण को रोकना है तो शुरुआत घर से होनी चाहिए। अगर वो अपने घर में खुश नहीं है , तो वो कहीं खुश नहीं है।” घरेलू हिंसा आजकल एक ऐसे नासूर की तरह हमारे समाज मे फ़ैल रहा है जिससे पीछा छुड़ाने अब आवश्यक हो गया है।

क्या मारपीट ही घरेलू हिँसा है ?

घरेलू हिंसा के तहत मारने पीटने की घटनाएं पढ़ने और सुनने को मिलती हैं। 

घरेलू हिंसा सिर्फ शादी के बाद मारपीट ही नहीं होती बल्कि अगर आपके परिजन आपको पढ़ने से रोकते हैं, आपकी मर्जी के खिलाफ शादी तय करते हैं, आपके पहनावे पर रोकटोक लगाते हैं तो ये भी घरेलू हिंसा के अंतर्गत आता है।

"अगर कोई पति पत्नी की मर्जी के खिलाफ शारीरिक सम्बन्ध बनाता है तो ये भी हिंसा के अंतर्गत आता है। 

लेकिन अकसर ये हिंसा है ये कोई मानने को तैयार ही नहीं होता  महिलाओं को पता ही नहीं हैं होता कि उनके साथ हिंसा हो रही हैं।

शारीरिक हिंसा - किसी महिला को शारीरिक पीड़ा देना जैसे मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, लात-घूसा मारना, किसी वस्तु से मारना या किसी अन्य तरीके से महिला को शारीरिक पीड़ा देना शारीरिक हिंसा के अंतर्गत आता है

यौनिक या लैंगिक हिंसा – महिला को अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिए विवश करना, बलात्कार करना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना, महिला की पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना इसके अंतर्गत आता है।

मौखिक और भावनात्मक हिंसा – किसी महिला या लड़की को किसी भी वजह से उसे अपमानित करना, उसके चरित्र पर दोषारोपण लगाना, शादी मर्जी के खिलाफ करना, आत्महत्या की धमकी देना, मौखिक दुर्व्यवहार करना।

आर्थिक हिंसा - बच्चों की पढ़ाई, खाना, कपड़ा आदि के लिए धन न उपलब्ध कराना, रोजगार चलाने से रोकना, महिला द्वारा कमाए धन को जबरदस्ती छीन ले ना आर्थिक हिँसा के अन्तर्गत आता है

चारदीवारी के भीतर होने वाली हर हिंसा घरेलू हिंसा की श्रेणी में आती है. दो लोगों के बीच जब प्यार, सम्मान और सहानुभूति की भावना समाप्त होकर नफरत और क्रूरता में तब्दील हो जाती है तो वो घरेलू हिंसा बन जाती है.

ये शारीरिक, सेक्सुअल और व्यवहारिक तीनों ही तरह की हो सकती है।

महिलाओं को आज भी जीती-जागती इंसान से ज्यादा अपनी संपत्ति के तौर पर देखा जाता है जिसकी अपनी कोई इच्छा-अनिच्छा नहीं होती। 

घर की महिलाओं पर सब कुछ जैसे थोपा जाता है, यहां तक कि इच्छाएं भी।

उसे वह सब करना होता है जो उसे करने के लिए कहा जाता है, जैसे ही वह अपनी बात कहती है या किसी बात का विरोध करती है वैसे ही उसको वह सब कुछ सहना पड़ता है जो उसने कभी सोचा भी नहीं होता, जिसे घरेलू हिंसा कहा जाता है।

सरकार चाहे घरेलू हिंसा को रोकने के कितने ही कदम उठा ले पर जब तक महिलाएं स्वयं इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगी तब तक कुछ नहीं हो सकता।

अक्सर हम देखते हैं कि महिलाओं के शरीर पर जहां-तहां चोट के निशान दिखते हैं। जिन्हें देखकर साफतौर पर कहा जा सकता है कि वे शारीरिक चोट के निशान है पर वे बहाना बनाकर उसे छिपा लेती है।

चुप रहना और सहते जाना या फिर आत्महत्या करना, गलत है। महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कई तरह के कानून बन चुके हैं पर ये उनकी मदद तभी कर सकते हैं जब वे खुद अपनी मदद करे, इसके खिलाफ शिकायत करे।

अनु गुप्ता

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