समीक्षा: 'दत्ता' शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की अनुपम कृति #विश्व पुस्तक दिवस

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास 'दत्ता' मैंने बहुत बार पढ़ा है। आज २३ अप्रेल यानि 'विश्व पुस्तक दिवस' के अवसर पर मैं आपको अपनी पसंदीदा पुस्तक 'दत्ता' से परिचय कराती हूॅ॑।

शरतचन्द्र जी के उपन्यास 'दत्ता' की नायिका १८-१९ वर्ष की एक साधारण नवयुवती से परिस्थितियों के चलते कैसे एक सशक्त नारी के रूप में उभर कर आती है, ‌यह पढ़कर ही समझा जा सकता है।

बाॅ॑ग्ला भाषा के महान साहित्यकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले मूर्द्धन्य उपन्यासकार हैं। उनकी रचनाएं जनमानस के विचारों को प्रतिबिंबित करती हैं। उनकी रचनाएं देवदास, श्रीकांत, चरित्रहीन, परिणीता पर फिल्म और सीरियल बने हैं। उनकी रचनाएं तत्कालीन बंगाल के सामाजिक जीवन से रूबरू कराती हैं। इनके साथ ही शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की दत्ता, बिराज बहू, मझली दीदी, शुभदा, गृहदाह, विप्रदास, ब्राह्मण की बेटी,  लेन देन आदि लोकप्रिय हैं।

आइए देखते हैं 'दत्ता' की कुछ झलकियां, मिलते हैं पात्रों से, जानते हैं सार 'दत्ता' का...

कथानक

'दत्ता' बंगाल के हिंदू धर्म की सनातन संस्कृति  और ब्राह्मसमाज  की प्रगतिवादी सोच में समाज कैसे विभाजित हो रहा था, इस बात  पर आधारित तीन अभिन्न मित्र वनमाली, जगदीश और रासबिहारी के जीवन की कहानी है। जो लड़कपन में वकील बनकर समाज सुधारक बनने, एक साथ रहने  और विवाह न करने की सौगंध लेते हैं परंतु कालांतर में तीनों अलग हो जाते हैं।

विजया, वनमाली की पुत्री के जीवन में दो अलग-अलग व्यक्तित्व के नवयुवक आते हैं , एक रासबिहारी का पुत्र, विलासबिहारी और दूसरा जगदीश का पुत्र नरेंद्र। बहुत ही भली भांति एक युवती के मन के भावों को विभिन्न परिस्थितियों में दर्शाया गया है। किस प्रकार विजया पिता की मृत्यु के बाद सही निर्णय पर पहुंचने में सफल होती है और किसे अपना जीवन साथी चुनती है, इसका कहानी के देश व काल के अनुसार विस्तार से वर्णन किया गया है।

कहानी के प्रारंभ में विजया एक १७-१८ वर्ष की साधारण नवयुवती के रूप में सामने आई जो एक दौलतमंद पिता की पुत्री है। आगे चलकर विजया ने नारी का सशक्त अवतार धारण किया।

कहानी का विस्तार

उपन्यास बंगाल के संभ्रांत परिवारों की कहानी है। जो हुगली के आस पास के तीन गांवों से शुरू हो कर कलकत्ता और इलाहाबाद तक गई। बाद में उन्हीं गांवों में  जाकर कथा का विकास हुआ।

संवाद प्रभावशाली हैं, उपन्यास को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए।

पात्र परिचय

कहानी के प्रमुख पात्र हैं, जमींदार वनमाली,  विजया, जगदीश, डाॅक्टर नरेन्द्र,  रासबिहारी, विलासबिहारी जिनपर कहानी केंद्रित है।  दयाल व नलिनी बाद में कहानी में प्रवेश करते हैं और कहानी को एक नयी दिशा की ओर मोड़ने में सहायक होते हैं। कहानी को परिणाम तक पहुंचाने में निसंदेह उनकी भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।  कालीपद, बूढ़ा दरबान तथा एक बच्चा परेश भी कथा में आते हैं।

उपन्यास के मानक

कहानी की पृष्ठभूमि, रोचकता, रवानगी, संवादों का प्रस्तुतीकरण, प्रत्येक व्यक्ति के चरित्र को उभार कर सामने लाना, काल व समय के हिसाब से मर्यादा का पालन करते संवाद, घटनाक्रम सभी 'दत्ता' को एक सर्वश्रेष्ठ उपन्यास की श्रेणी में स्थान देते हैं।

उपन्यास मूलतः बाग्ला में लिखा गया है जिसका अनुदित रूप हिंदी भाषा में उतना ही अद्भुत है, कथा को जीवंतता देती है, भाषा। शरतचन्द्र कलम के धनी थे,  सरल प्रवाह से कैसे लोगों को अपने साथ शामिल कर लेना है, भली प्रकार जानते थे।

उपन्यास का आवरण कवर कहानी को परिलक्षित करता है।

उपन्यास का शीर्षक 'दत्ता' कहानी के साथ न्याय करने में सक्षम है।

उपन्यास से कुछ अंश

"जिस ठूंठ वट-वृक्ष को साक्षी किया था, वह किसी के विरुद्ध कोई मुकदमा न चलाकर चुपचाप हंसता रह गया।"

" जो नहीं चुका सकता, वह कुसंतान है; उसे आश्रय देना उचित नहीं है।"

"जो अच्छा काम है, उसका अधिकार मनुष्य भगवान से ही पाता है, उसे किसी के सामने हाथ फैलाकर नहीं लेना होता।"

" हमारे शास्त्र में लिखा है दरिद्र भगवान की विशेष मूर्ति है। उसकी सेवा का अधिकार सभी को है।"

"मेरी दो संतानों में से एक काम में पागल और दूसरी दया-माया में उन्मादिनी! एक कठोर कर्मठ, दूसरी स्नेह  की निर्झरणी!"

"सत्य का स्थान हृदय में है, मुख में नहीं।"

"उसके लज्जा ललित मुख पर दक्षिण पवन एवम् आकाश की ज्योत्सना मानो एक ही समय ही स्वर्गीय माता-पिता के आशीर्वाद की भांति आ पड़े।"

मेरा कहना

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने जनमानस को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे और यह उपन्यास भी कोई अपवाद नहीं है। शरत् साहित्य तत्कालीन बंगाल के लोगों की जीवनशैली एवम् विचारों का दर्पण है। 'दत्ता' शरतचन्द्र जी की अनुपम रचना है।

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय जी की रचना के बारे में कुछ कहना सूरज को रोशनी दिखाने की हिमाकत करने जैसा है। मैं करबद्ध हूॅ॑ , क्षमा चाहती हूॅ॑ परंतु मेरे ह्रदय के समीप है ,'दत्ता', इसीलिए मैं लिखने की ध्रष्टता कर पाई।

दोस्तों, 'विश्व पुस्तक दिवस' के अवसर पर पर आप भी 'दत्ता' को एक बार पढ़कर देखिएगा जरूर, पुस्तक के चुनाव की प्रशंसा किए बिना नहीं रहेंगे।

धन्यवाद।
आपकी प्रियंका सक्सेना की कलम से

#विश्व पुस्तक दिवस

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