एक लड़की हो तुम !

एक लड़की हो तुम !

अंजली ऊठो कब तक सोती रहोगी ?  कुछ घर ग्रहस्थी का काम सीख लो ? एक लड़की हो तुम ,  काम तो सीखना ही पड़ेगा तुम्हें ? मां की बात सुनकर अंजली ऊठी और मां की बातों पर जोर जोर से हंसने लगी ...आप भी न माँ , कोई कुछ नहीं कहेगा मुझे ? अंजली की बात सुनकर मां को गुस्सा आया और उन्होंने फिर कहा :- बहुत हुआ ऐसे दांत निकालकर मत हंसों कल को पराये घर जाना है ! अब मां , अंजली को बात बात पर डांट रहीं थी घर के कामों को सीखने को लेकर | पर , अंजली का जरा भी मन न था कि वह इतनी जल्दी खुद को घर ग्रहस्थी में धकेल दे उसके अपने सपने थे जिसे वह जीना चाहती थी पर नहीं | अंजली की मां तो मां , बल्कि उसके नाते रिश्तेदार भी यहीी कहते | किसी भी तरह अंजली यदि मां को समझा देती कि मां मत सोचो कि लोग क्या कहेंगे ? मुझे वक्त चाहिये अभी ! लेकिन , रिश्तेदारों को कौन समझाता भला जितने मुंह उतनी बांते होती कि अंजली घर का काम नहीं सीख रही अब वह शादी के लायक हो    

  सबकी बातों से अंजली तो परेशान ही थी साथ ही उसके माता व पिता भी | अंत में अंजली सबकी जिद के आगे घुटने टेक देती है और वह मां कि सीख के हिसाब से ऐसे मत चलो , जल्दी उठा करो , ऐसे मत खाओ , सलीके से रहना सीखों !

सब कुछ सीखकर माता पिता की इच्छानुसार अपने सपनों का त्याग कर ससुराल चली गई | ससुराल में भी उसे कोई खास सुख नहीं था वहां भी वह दिनभर घर के काम करती और सबकी बातें सुनती धीरे धीरे अंजली के मन में प्रश्नों ने डेरा जमा लिया वह दिखावटी दुनिया में जीने लगी थी मन की बात किसी से न कह सकी | यह कहानी मात्र अंजली की ही नहीं बल्कि हर महिलाओं की है बहुत सी महिलायें सच्चाई व झूठ और दिखावे की दुनियां में जीवनयापन करती हैं चाहे वह कितने अत्याचार क्यों न सहे | वह हर हाल में अपने बच्चों पति व बुजुर्गों की सेवा करती हैं घर संभालती हैं व अपने दुख को बंया नहीं होंने देती | अपने कर्तव्यों की खातिर अन्याय के खिलाफ आवाज भी नहीं उठातीं | चुप रहती हैं पर क्यों ? शायद हर लड़की को यह सीख दी जाती है कि ससुराल ही सब कुछ है आज भले ही लड़कियां , लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहीं हैं लेकिन हर रिवाज हर कायदे उन्हें ही सिखाये जाते हैं ऐसे मत चलो ? ऐसे मत खाओ, जल्दी उठो , तेज मत बात करो , पर क्यों ? आज भी एक लड़की अपने हर सपने को खुलकर नहीं जी सकती 

  जब एक बेटी का जन्म होता है तब उसे सिर्फ काम सीखने की वस्तुऐ जैसे किचिन सेट , गुड़़िया वगैरह ही भेंट किये जाते है पर लड़के के लिये ? लड़कियों के साथ भेदभाव बचपन से ही किया जाता है कि उसे ससुराल संभालना है वह पराया धन है एक लड़की ससुराल चली तो जाती है पर जब उसे कोई कष्ट हो तब भी उसे समाज की खातिर झूठा दिखावा करना पड़ता है क्यों आज भी महिलायें खुलकर अपना मत नहीं रख पाती ? वह खुलकर हंस नहीं सकती ? सारे कर्तव्यों को महिलायें ही निभाती हैं फिर भी कब तक वह खुद को कठपुतली की तरह ढ़ालकर औरों के हिसाब से चलती रहेंगीं | बदलते वक्त के साथ महिलाओं के लिये बनाये गये नियमों में भी बदलाव लाना चाहिये | जैसा कि कहानी में अंजली मन की बात को मन में ही समाहित कर लेती है वैसा किसी के साथ न हो |       

                                                                                   

 धन्यवाद                                                             

    रिंकी पांडेय

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