एक माँ का फैसला

एक माँ का फैसला

"पापा कल ऑफिस से छुट्टी ले लेना स्कूल में मीटिंग है" नेहा ने पापा के गले में झूलते हुए कहा।

"पर बेटा कल तो मेरी एक क्लाइंट के साथ जरूरी मीटिंग है, तुम मॉम को ले जाओ" रवि ने कहा|

"आपके पास समय नहीं तो रहने दो, मैं मैनेज कर लूँगी|"

"मॉम की वहाँ क्या जरूरत?" कहते हुए नेहा अपने रूम में चली गई।

रमा दोनों की बातें सुन रही थी| उसे नेहा का इस तरह का बर्ताव अच्छा नहीं लगा। क्या नेहा की नजरों में मेरी कोई वैल्यू नहीं? आखिर मुझे स्कूल ले जाने में नेहा को क्या प्रॉब्लम है? रमा का उतरा चेहरा देखकर रवि ने बाहों में भरते हुए कहा "क्यों टेंशन लेती हो? शायद वो तुम्हे परेशान नहीं करना चाहती होगी, इसलिये तुम्हारे लिये मना किया होगा उसने। चलो न तुम्हारे हाथ की गरमागरम चाय पिला दो।" बिना मन के रमा किचन में चाय बनाने चली गई।

अगले दिन नेहा बिना कुछ बोले स्कूल निकल गई। रवि भी अपने काम के कारण स्कूल नहीं जा पाये। रमा घर के कामों में व्यस्त थी तभी फ़ोन की घंटी बजती है। "हैलो मिसेज़ गुप्ता, मैं नेहा की क्लास टीचर बोल रही हूँ। कल स्कूल में पेरेंट्स टीचर मीटिंग थी, नेहा ने कहा कि आप दोनों जॉब करते हैं इसलिए स्कूल नहीं आ पाए। आप जब भी फ्री हों स्कूल आ कर उसका रिपोर्ट कार्ड देख लें।"

आखिर नेहा को झूठ बोलने की क्या जरूरत है? मैं तो दिनभर घर पर ही रहती हूं। क्या मैं उसे बिल्कुल पसंद नही? पुरानी बातें भी रमा को याद आने लगीं। क्यों वो अपने दोस्तों को कभी घर नहीं बुलाती? कुछ दिनों पहले स्कूल के एनुअल फंक्शन में भी सिर्फ रवि गए थे मुझे साथ ले जाने के लिए उसने बहाना बना दिया था पर उस समय उसने इतना गौर नहीं किया था। ऐसा क्या हो गया मुझसे कि नेहा किसी से भी मेरा परिचय नहीं करवाती। रमा का मन में बहुत उथल पुथल चल रही थी।

नेहा के स्कूल से आते ही रमा से रहा न गया उसने अपने गुस्से को काबू करते हुए नेहा से पूछा "ऐसी क्या वजह है कि तुम्हें स्कूल में झूठ बोलना पड़ा। तुम मुझे अपने किसी भी दोस्तों से मिलवाने में भी कतराती हो। क्या मेरा कोई वजूद नहीं"?

रमा के बार बार पूछ्ने पर नेहा ने कहा "मेरे सभी दोस्तों की मम्मी जॉब करती हैं, उनका नाम है, अपनी पहचान है| पर मेरी मम्मी कुछ नहीं करती, घर पर ही रहती हैं। इसलिये मैं सबसे यही बोलती हूँ कि मेरी मॉम भी जॉब करती हैं जिससे दोस्तों में मेरी इज्जत बनी रहे और मुझे शर्मिंदगी न हो।"

नेहा की बात सुनकर रमा शून्य हो गई तो क्या जॉब करने वाली औरत की ही समाज में इज्जत है? घर में रहने वाली औरत का कोई वजूद नहीं?

रमा ने नेहा को अपने पास बैठाया और बोली "शायद तुम्हे नहीं पता शादी से पहले मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में बतौर इंजीनियर थी, मैं बहुत महत्वाकांक्षी थी। मुझे लगता था कि शादी के बाद भी मैं मैनेज कर लूंगी। तभी एक घटना ने मुझे हिलाकर रख दिया। मेरी एक सहकर्मी जो दो वर्ष के बेटे की माँ थी| बच्चे को उसने अपने माता पिता के घर छोड़ा, लेकिन बूढ़े माँ बाप हर बार अपनी लाचारगी जताते। फिर बच्चे को उसने आया और झूला घर में भी छोड़ा तो वह बीमार और चिड़चिड़ा हो गया। मेरी कलीग हमेशा फोन पर होती, कभी वो रोती कभी उसका बच्चा। इस कारण वह काम पर भी ध्यान नहीं दे पाती। मुझे उस पर गुस्सा आता, बच्चे पाल नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हैं। उससे पूछा तो पता चला कि कोई आर्थिक समस्या नहीं है, लेकिन उसने यहाँ तक पहुँचने के लिए इतनी मेहनत की है, इसे वह ऐसे कैसे छोड़ दे। उसे देखकर ही मैंने निश्चय किया कि जब मेरे बच्चे होंगे, मेरे समय पर पहले उन्ही का हक होगा। इसलिए जब तुम पैदा हुई मैंने नोकरी छोड़ दी।"

रमा बिना रुके बोली जा रही थी।

"जिस बच्चे की परवरिश के लिए मैंने अपना कैरियर अपनी नौकरी छोड़ी, उसकी नजरों में मेरी कोई पहचान नहीं। उसको अपने दोस्तों के साथ माँ का परिचय देने में शर्मिंदगी होती है!"

नेहा की आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। "मेरी सोच गलत थी कि मेरी मम्मी कुछ नहीं करती| मुझे माफ़ कर दो, सही मायने में तो आपकी जॉब सबसे कठिन है, आप घर की होममेकर हो।"

रमा ने नेहा को गले से लगा लिया। रमा की सभी नाराजगी और गिले शिकवे दूर हो चुके थे।

दोस्तों, एक माँ की जिम्मेदारीयों को परिभाषित नहीं किया जा सकता, ये अंतहीन है। लेकिन, आज भी हमारे समाज में घरेलू महिला के बजाय नोकरीपेशा महिला को ज्यादा तवज्जो दी जाती है। जिस तरह कैरियर में अपना सौ फीसदी देना जरूरी है उसी तरह घर भी पूर्ण समर्पण और समय की मांग करता है।

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धन्यवाद

@बबिता कुशवाहा

#mylifemychoices

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