गन्तव्य

गन्तव्य

शीर्षक "गतंव्य"
विवाह बंधन में बंधी तान्या प्रतिकूल वातावरण से निराश तो होती। पर फिर सब कुछ अपने अनुकूल बनाने ,नित नये प्रयासो में जुट जाती,फिर भी सबको खुश नहीं रख पाती।तिस पर जतिन की अपेक्षा और उपेक्षा,उसे निराशा के उस गर्त में ले जाती।जहां से उसे सब टूटा बिखरा नजर आता--पर कहते है ,ना जहां किस्मत सौ दरवाजे बंद करती ,वही ईश्वर एक दरवाजा जरूर खुला रखता है,

उम्मीद का,हौसलो का जो उसे टूटकर भी टूटने नहीं देता। हां उम्मीदें चाहे जितनी भी छोटी हो,आशा की एक किरण भी कभी-कभी बड़े -बड़े हौसंले जगा देती है-----ऐसा ही हौंसला वो नन्हीं    
चीटीयां तान्या के मन में जगा रही थी।जो शक्कर के छोटे-छोटे दानों को बड़े जतन से गतंव्य तक पहुंचा रही थी। 
                  और तान्या नई ऊर्जा ,नये उल्लास से अपने पुरानी जॉब के लिये फिर से रेडियो स्टेशन की तरफ कदम बढ़ा रही थी---अपने जीवन की बाकी मिठास को गंतव्य तक पहुंचाने के लिये ।

          Manju Shrivastav

#माय लाइफ,माय च्वाईस"

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