घर की मुर्गी दाल बराबर !

घर की मुर्गी दाल बराबर !

फोन की घंटी लगातार बज रही थी सिया ने फोन उठाया सामने से सिया की बहन बात कर रही थी :- दीदी कुछ भेजा है आपको फुर्सत के पलों में देख लेना | सिया ने कहा हाँ ....तब तक आवाज आई सिया , बहु दवाई देना जरा घुटनों में बहुत दर्द है ! सिया की सास ने कहा | सिया घर की इकलौती बहु थी आते ही उसने घर को स्वर्ग बना दिया था सुबह उठकर घर के सारे कामों को नियमपूर्वक करती | जल्दी से नहा धोकर चाय पतीले में चढ़ाकर पूजा अर्चन करती फिर पति व सास-ससुर को बारी - बारी से कमरे में जाकर चाय देती | सिया चैन से चाय के दो घूंट भी न ले पाती कि पति के ऑफिस का समय हो जाता वह फटाफट पतिदेव का नाश्ता तैयार करती और पतिदेव तब तक नहा धोकर तैयार होकर नाश्ता करके ऑफिस जाते हैं | अगले पल सिया घर के काम करने लग जाती सारे घर को व्यवस्थित करती है फिर लंच का समय उसके बाद एक एक करके घर के काम निपटाती है ऐसे ही कुछ साल बीतने के बाद सिया दो बच्चों की माँ बन जाती है अब घर के खर्च भी बढ़ चुके थे और पति की जिम्मेदारियाँ भी | सिया बुटीक का काम अच्छे से जानती थी उसने सोचा बाहर जाकर काम करने से अच्छा है घर पर ही बुटीक का काम कर लिया जाये जिससे पतिदेव की कुछ मदद भी हो जायेगी और घर के सारे काम भी निपट जायेगें इतना सोचकर सिया ने बुटीक का काम शुरू किया | सिया का काम सबको बहुत पसंद आया और सिया की छोटी सी बुटीक की दुकान चल पड़ी थी और अब सिया भी अब घर को चलाने में पति का साथ देने लगी थी | सिया का दिन सुबह पाँच बजे शुरू होता था जल्दी से बारी - बारी करके बच्चों को जगाना फिर पति को जगाना और पति और सास ससुर को चाय देने के बाद बच्चों का टिफिन तैयार करके उनके स्कूल की तैयारी करना फिर उन्हें स्कूल भेजना | अब बारी थी पतिदेव के ऑफिस की तैयारी की | बच्चों को स्कूल भेजने के बाद वह फटाफट पतिदेव के ऑफिस की तैयारी में लगती है सभी के जाने के बाद सिया ने घर का काम निपटाया |                                                                                                                                                                        काम निपटाने के बाद सिया लंच की तैयारी में लग गई इसी बीच सिया अपनी बुटीक के काम को भी करती जाती जैसे किसी के आने पर उसका नाप जोख वगैरह वगैरह | दिन के लगभग दो बज जाते हैं सिया बच्चों को स्कूल से घर लाती है फिर सभी को लंच कराकर किचिन का सारा काम अकेले ही निपटाती है क्योंकि सिया की सास उम्रदराज हो गयी थी और सिया के आने के बाद उनकी काम की आदत भी खत्म हो गयी थी | सिया सारा काम निपटाने के बाद अपना बुटीक का काम निपटाती है जहां वह अपने ग्राहक को भी संभालती और पैसे का हिसाब भी करती सब काम हुआ ही था कि शाम के चाय नाश्ते का वक्त हुआ | सिया ने पतिदेव के ऑफिस से आते ही चाय बनायी फिर बच्चों को पढ़ाने बैठाती है | सिया करीब एक से दो घंटे बच्चों को खुद पढ़ाती कि ट्यूशन का पैसा बच जायेगा | सब कुछ निपटाने के बाद सिया ,रात के खाने की तैयारी करती है बच्चे टी. वी . देखने में मशगूल हो जाते हैं और पतिदेव अपने लैपटॉप पर, सास ससुर अपने कमरे में और यहाँ सिया अपनी रसोई घर में सबकी इच्छानुसार खाना बनाने मे व्यस्त थी कि अचानक से घर का फोन बजता है फोन पर सिया की सास की बहन थी और वो सिया के घर आने वाली थी सिया उनके आने की खबर से बहुत खुश होती है बात खत्म करके सिया रात का खाना तैयार करके सबको टेबिल पर खाना लगाती है | सभी लोग खाना खाकर अपने अपने कमरे में जाते हैं सिया रसोई की सारी सफाई करके सासुमां के पास जाकर उन्हें दवाई देती है फिर जाकर वह आराम करती है | अगली सुबह सिया सारा काम करती है करीब दस बजे सिया की मौसी सास अपने बेटे के साथ घर आती है सिया ने उनकी खूब आवभगत की उन्हें सम्मान देने के साथ - साथ अपना हर काम सिया जिम्मेदारी से निभा रही थी सिया का काम देखकर सिया की मौसी सास ने, सिया की सास से कहा :- बहन, तुम बहुत किस्मत वाली हो ! जो तुम्हें सिया जैसी बहु मिली | सिया ,  घर परिवार की जिम्मेदारी के साथ साथ बुटीक भी संभाल रही है और पति को बखूबी सहयोग दे रही है | तब सिया की सास ने कहा :- अरे इतने में क्या होता है भला ? बुटीक से भी घर खर्च चलता है क्या कभी ? और घर का काम करने में कितना समय लगता है कौन नहीं करता घर का काम ? सिया ने दोनो के बीच की बातें सुनी और वो दुखी हो गयी अब सिया भारी मन से सारे काम करती है उसे कहीं न कहीं प्रतीत होंने लगा था कि मेरी इस घर में कोई खास अहमियत नहीं यहीं कहना उसके पतिदेव का भी था उनकी भी सोच अपनी माँ की तरह ही थी | सभी काम निपटाने के बाद सिया अपने कमरे में गई और सभी बातों को दिमाग से निकालने के लिये उसने मोबाईल खोला जिस पर एक वीडियो था उसका टाईटल था घर की मुर्गी दाल बराबर जिसमें साक्षी तंवर ने बहुत अच्छी भूमिका निभाई थी उस वीडियो में वह सब कुछ वैसा ही था जैसा सिया के साथ हो रहा था सिया वीडियो को देखकर समझ जाती है कि इस घर के लिये मैं भी घर की मुर्गी दाल बराबर हूँ जिस घर को दिन रात संवारने में जुटी रहती हूँ वहाँ सच में मेरा कोई मोल नहीं यही सब सोच सोचकर सिया की आँख लग जाती है | और अगले दिन वह अपना वर्चस्व तलाशने का प्रयास करती है |                                                                                                                                              विचारविमर्श :- प्यारी सखियों एक औरत घर को बड़े प्यार और शिद्दत से संवारती है घर को चलाने में ऐड़ी चोटी का जोर लगा देती है बिना किसी स्वार्थ व शिकायत के जिस घर को वह अपना बनाती है पर क्या उसे जरा सा हक भी प्राप्त होता है कि, वह अपना काम अपनी मर्जी से कर सके ? वह पाई पाई के हिसाब का लेखा जोखा से लेकर हर छोटे बड़े का को खुद करती है बिना किसी मदद के | बदले में उसे क्या मिलता है ? क्या वो अपनी पहचान बना पाती है ? जिस घर में वो पूरी उम्र बिताती है वहां उसे घर की मुर्गी दाल बराबर की भांति ही समझा जाता है | अर्थात् दिन रात सर्वस्व न्यौछावर करने के बाद भी शायद उसका कोई आदर नहीं ! धन्यवाद !! रिंकी प्रीति पांडेय !!                                                   #दादी नानी की कहावतें मुहावरे 

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