हैप्पीनेस अनलिमिटेड- मेरी प्रिय पुस्तक

हैप्पीनेस अनलिमिटेड- मेरी प्रिय पुस्तक

#ThePinkComrade
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 मेरे मन में इतने सवाल चलते थे कि क्यों मेरी खुशी हर समय गायब हो जाती है किसी एक चीज को पा लेने के बाद फिर दोबारा मुझे ऐसी महसूसता क्यों होती है कि मैं दोबारा कोई चीज की इच्छा करने लग जाती हूं कि मुझे खुशी मिले और इसी का जवाब मुझे मेरी प्रिय पुस्तक हैप्पीनेस अनलिमिटेड के अंतर्गत मिला। ये किताब ब्रह्माकुमारी शिवानी दीदी द्वारा लिखी गई है और जिसकी वजह से मैंने जाना कि खुशी क्या है।

इस पुस्तक में हमारे खुशी के अलग अलग कारण बताए गए हैं। इस किताब में हमारे अहसास हमारे संस्कार परिवर्तन की बात बताई गई है। इस किताब के अनुसार दुनिया में इतनी कम ख़ुशी का कारण निर्भरता है। खुशी 'कुछ' या 'किसी' पर निर्भर नहीं है या 'कहीं भी' नहीं मिली है। हम अपनी खुशियों में तब तक देरी करते रहते हैं जब तक कि हमारी जिंदगी में चीजें सही न हो जाएं। हमें लगता है कि हम भविष्य में खुश रहेंगे और फिर सोचेंगे कि अब हम खुश क्यों नहीं हैं। खुशियाँ तभी संभव हैं जब हम हर किसी को, हर पल, हर परिस्थिति में, जैसे भी हों, स्वीकार कर सकें। इसका मतलब है कि दूसरों को पहचानने या विरोध करने, शिकायत करने और दोष देने का अंत, आलोचना करने और नियंत्रण करने का अंत और किसी के साथ प्रतिस्पर्धा करने का अंत।

खुशी भौतिक चीजों पर निर्भर नहीं है। ऑब्जेक्ट, पोजिशन, गैजेट्स हमें आराम देने के लिए बनाए गए हैं। शारीरिक आराम भावनात्मक आराम खुशी से अलग है एक भावना है। सुख हमारी आंतरिक रचना है और बाहरी आराम की परवाह किए बिना बनाया जा सकता है। अलग-अलग लोग एक ही उत्तेजना का उपयोग करके विभिन्न प्रतिक्रियाएं बनाते हैं।

खुशी उपलब्धि पर आधारित नहीं है यह उस गंतव्य पर नहीं है जो यात्रा पर है। खुशी एक ऐसी अवस्था है, जो लक्ष्य की ओर काम करते हुए बनाई जाती है, न कि लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद अनुभव की जाने वाली भावना। जब मैं खुश रहूंगा और दूसरों का ध्यान रखूंगा तब वे खुश होंगे। खुशी स्थितियों के बावजूद मन की एक स्थिर स्थिति है और इसलिए खुशी हमारी ताकत है।

किसी भी स्थिति में मेरी पहली जिम्मेदारी मेरे मन की स्थिति को संभालने की है क्योंकि वही एकमात्र चीज है जो मेरे नियंत्रण में है। मैं शांति नहीं चाहता, लेकिन मैं शांति हूं। मैं शांति से रहूंगी और बाहर की चीजें करूंगी। खुशी लोगों पर निर्भर नहीं है। कोई भी मुझे खुश नहीं कर सकता है और मैं दूसरों को खुश नहीं कर सकता, जब तक कि हम इसे खुद नहीं करना चाहते। 

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मेरे चोट, दर्द, भय या क्रोध के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है। उनके व्यवहार के जवाब में यह मेरी अपनी रचना है। मेरे पास एक और विकल्प है। हमारा व्यक्तित्व पांच प्रकार के संस्कारों का संयोजन है जो हम आमतौर पर अपने माता-पिता से इस समाज से प्राप्त करते हैं, लेकिन इन स्थितियों में ये व्यक्तित्व हमारा असली व्यक्तित्व ना होकर यह एक झूठा व्यक्तित्व है। असली संस्कार तो हमारा शांति प्रेम पवित्रता खुशी यह हमारे अपने असली संस्कार हैं जो कि हर व्यक्ति के भीतर मौजूद हैं।

तो अब हमें अपनी सोच पर काम करना होता है जिससे कि अगर हमारी सोच बदलेगी तो हमारा जो शब्द है कर्म है वह अपने आप बदल जाएंगे हमारी जितना भी कर्म है हमारी बोली है यह हमारे सोचने पर निर्भर है। मेरी हर सोच मेरी एहसासों पर टिकी है तो अब अगर मुझे अच्छा महसूस नहीं हो रहा है तो रुके और देखें कि कहां मेरी सोच में किस लिए अच्छा नहीं लग रहा है क्या है जो हमारे अंदर चल रहा है।

मेरा मानना है कि जबसे मैंने ये किताब पढ़ी है मुझमें एक आत्मविश्वास आ गया क्योंकि अपने मन को कैसे हर समय शांत और खुश रखा जाए विपरीत परिस्थितियों में भी वो मुझे इस किताब को पढ़ने से मिली है। आपको भी एक बार इस किताब को पढ़ना चाहिए।

मेरा लेख पढ़ने के लिए आप सभी पाठकों का तहेदिल से धन्यवाद।❤️
हैप्पी{वाणी} राजपूत

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