हक़ पति का

हक़ पति का

विवाह का अर्थ है- दो दिलो का, आत्माओ का और दो शरीरो का मिलन। दुख की बात है कि कुछ पतियो के लिये विवाह का अर्थ केवल एक ही है-'शरीरो का मिलन।' क्योकि उन्हे लगता है कि यह उनका हक़ है। पत्नि की रजामंदी ऐसे लोगो के लिये कुछ मायने ही नही रखती है और हमारे समाज के अधिकतर लोगो का भी यही मानना है कि शादी हो गयी है तो पति कुछ भी कर सकता है। आज का मेरा लेख इसी विषय पर है- 'वैवाहिक बलात्कार'।इस बात को मै एक सत्य घटना के द्वारा समझाना चाहूंगी।

शादी के बाद मैं अपने मायके गयी हुई थी। मेरे पडो़स में रहने वाले लड़के नील की शादी थी। शादी के दो दिन बाद उसकी पत्नि रेखा को अपने मायके जाना था। शादी के दो दिन बाद पडो़स की कुछ औरते बाते कर रही थी। सब बोल रही थी कि रेखा ने पगफेरे के लिये मायके जाने से मना कर दिया है। सबके अपने-अपने अनुमान चल रहे थे रेखा के बारे में। इतने में ही कचरेवाली कचरा लेने आई। उसने भी सबकी बाते सुनी और फिर जो उसने बताया, मेरे तो रोंगटे खडे़ हो गये।

वह बोली-अरे! जानवर है जानवर नील। योनि फट गयी है रेखा की। इसलिये बेचारी ने मायके जाने से मना किया है। क्या बताती मायके में? टाँके लगे है योनि में उसकी। डाक्टर ने बताया कि बलात्कार हुआ है उसका।

उसकी यह बात सुनकर सभी औरतें हँसने लगी और बोली- कैसी पागलो वाली बात कर रही है तू। पति का तो ये हक़ है। ये बलात्कार थोडे़ ही होता है। फालतू की बातें मत किया कर।

उन सबकी बातें सुनकर मै जैसे सुन्न पड़ चुकी थी। कैसा समाज है और समाज की सोच। लड़की का कोई हक़ नही है, सभी हक़ लड़के के। औरत होकर दूसरी औरत का दर्द नही समझ पा रही हैं। क्यो है इतनी दोहरी और दोगली मानसिकता इस समाज की? मन द्रवित हो उठता है।

आप सभी इस विषय में क्या सोचते है? अपनी राय अवश्य दें।

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