दाएं हाथ से दान करो व बाएं हाथ को ना चले पता

दाएं हाथ से दान करो व बाएं हाथ को ना चले पता

साध्या एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी। घर में उसके अलावा मम्मी पापा, छोटा भाई और दादी थी। पढ़ाई पूरी होते ही साध्या ने एक बेसरकारी बैंक में नौकरी कर ली थी। सारा हफ्ता ऑफिस के काम में व्यस्त रहती और छुट्टी के दिन अपने छोटे भाई विकास की पढ़ाई में मदद करती और समय मिलता तो दादी और मम्मी के साथ घर के काम में मदद करती थी। परिवार भले ही साधारण था पर भाई बहन में संस्कार और दुनियादारी की समझ पूरी थी।

एक दिन शहर के नामी व्यवसायी रमन सिंह जी बैंक में किसी काम से आये, जहां उनकी तबियत अचानक खराब हो गई। साध्या ने उनको बैठा कर पानी पिलाया और मैनेजर से बात कर उनका काम जल्दी से पूरा करवा कर उनको घर भेज दिया।

साध्या ने अपने व्यवहार और समझदारी से रमन जी के दिल में जगह बना ली थी। बैंक के मैनेजर से साध्या और उसके परिवार के बारे में पता कर वो उसके घर अपने छोटे बेटे सार्थक का रिश्ता लेकर जा पहुंचे।

साध्या के पापा सतीश जी ने उनका मान रखते हुए खातिरदारी करी और हाथ जोड़ कर कहा, "हम समाज के साधारण वर्ग से है और आपके परिवार में रिश्ता जोड़ने की हैसियत नहीं रखते हैं। ये एक बेमेल सम्बन्ध होगा इसलिए बेहतर होगा आप अपने बराबरी के किसी धनाढ्य समाज में रिश्ता देखें।"

"जिस परिवार के बच्चे बड़ो का सम्मान और मदद करना जानते हो वो ही असल में धनवान परिवार है। मैं चाहूंगा आप एक बार मेरे प्रस्ताव पर विचार कर साध्या बेटी की रजामंदी लेकर मुझे बताए", रमन जी ने कहा।

सतीश जी ने साध्या और उसकी दादी से इस बारे में बात करी और सबकी रजामंदी से बात आगे बढ़ाने की सोची। वहीं दूसरी तरफ रमन जी ने भी अपनी पत्नी, बड़े बेटे-बहु और बेटी-दामाद को सारी बात बताई और छोटे बेटे सार्थक को साध्या से एक बार मिलने के लिए बोला।

दोनों परिवार की रजामंदी से साध्या और सार्थक एक दूसरे से मिले और एक दूसरे को पसन्द कर इस रिश्ते के लिए अपनी सहमति जताई और जल्दी ही दोनों शादी के बंधन में बंध गए।

सतीश जी ने अपनी सामर्थ्य अनुसार किसी चीज़ की कसर नहीं रखी थी शादी में। साध्या भी अपने नए परिवार में खुश थी। सब कुछ ठीक ठाक था पर साध्या की मम्मी को अपनी बराबरी में बेटे शादी ना होने का अफसोस होता। हालंकि वो साध्या को कुछ बोलती नहीं थी पर उनका झुकाव हमेशा ही अपनी बड़ी बहू की ओर रहता जो कि उसी शहर के एक नामी परिवार से थी। साध्या सब कुछ देखते समझते हुए भी चुप रहती और परिवार के सभी सदस्यों को सम्मान देती। जेठानी रीमा को बड़ी बहन सा मान देती और ननद राशि को छोटी बहन की तरह लाड़ करती।

सार्थक सुबह ऑफिस जाते हुए साध्या को उसके बैंक छोड़ते हुए जाता और शाम को पिक अप कर लेता। दोनों कभी कभी ऑफिस से लौटते हुए राशि से मिलने चले जाते तो कभी तीनों भाई बहन अपने परिवार के साथ डिनर करने बाहर चले जाते।

ऐसे ही एक दिन सार्थक और साध्या अचानक ही राशि के यहां पहुंच गए। साध्या ने देखा राशि कुछ परेशान सी लग रही है लेकिन पूछने पर बात को टाल गई। साध्या ने अगले दिन ऑफिस से ही राशि को फ़ोन किया, वो तब भी थोड़ी परेशान लगी। साध्या ने आधे दिन की छुट्टी ली और पहुंच गई राशि के घर। बहुत पूछने पर राशि ने साध्या को बताया कि उसके पति रितेश को बिजनेस में बड़ा घाटा हुआ है और काफी कर्ज़ चढ़ गया है।

राशि ने आगे कहा, भाभी मैंने रितेश को पापा से मदद लेने को कहा लेकिन आपको तो पता है कि रितेश कितने स्वाभिमानी है वो कभी पापा से मदद नही लेंगे।

साध्या ने राशि को बोला की वो रितेश जी का कर्जा चुकाने में उनकी मदद करेगी। अभी वो उधार समझ पैसे ले ले और जब सब ठीक हो जाये तो लौटा देना और वो ये बात किसी को नही बताएगी। राशि आंखों में आंसू लिए साध्या के गले से लिपट गई।

साध्या बिना किसी को बताए हर महीने एक रकम राशि के एकाउंट में ट्रांसफर कर देती जिससे धीरे धीरे रितेश का काफ़ी कर्ज उतर गया था। एक दिन सार्थक बैंक के कुछ कागज़ ढूंढ रहा था कि उसके हाथ साध्या की बैंक की पासबुक लग गई, उसने देखा पिछले कुछ महीनों से वो एक फिक्स्ड अमाउंट किसी एकाउंट में ट्रांसफर कर रही है।

सार्थक ने रात को खाने के बाद साध्या से जब इस बारे में पूछा तो उसने बिना कुछ छिपाए राशि की समस्या बता दी।

"तुमने किसी को बताया क्यों नही"...सार्थक ने कहा।

"वो हमारे घर के दामाद है और उनकी इज्ज़त और स्वाभिमान बने रहे इसलिए मैंने किसी को कुछ नहीं बताया", साध्या ने कहा।

"पर तुम मुझे तो बता सकती थी"...सार्थक ने थोड़ा गुस्सा होते हुए कहा।

मेरी दादी कहती है, "दाएं हाथ से दान करो व बाएं हाथ को ना चले पता" और मैंने राशि की मदद की या तुमने की बात तो एक ही है। प्लीज तुम राशि से इस बारे में कुछ मत बोलना, साध्या ने कहा।

सार्थक की मम्मी जो बाहर बैठी हुई थी और उनके कानों में सारी बातें ही जा रही थी, सुनकर साध्या के प्रति अपनी सोच के बारे में अफ़सोस और ग्लानि हो रही थी।

धन्यवाद।

स्वाति रॉय

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