बच्चे की शिक्षा या अभिवावक पर दबाव

यह कहानी एक कहानी नही बल्कि एक समस्या है या यह कहिये कि आज के समाज की एक कड़वी सच्चाई है जिससे हर माता-पिता अवगत हैं और सबसे खास बात यह है कि सब कुछ जानते हुये भी वो इसे मुस्कुराकर स्वीकार कर रहे हैं ।

बच्चे की शिक्षा या अभिवावक पर दबाव

फिल्म का नाम - हिन्दी मीडियम ( 2017 )

मुख्य कलाकार - इरफान खान , सबा कमर।

फिल्म 'हिन्दी मीडियम' जो कि इरफान सर की फिल्म थी, वो इरफान सर जिनके अभिनय का लोहा पूरी फिल्म इंडस्ट्री मानती है और जिन्हें इस वर्ष हमनें खो दिया । इरफान सर की फिल्म की समीक्षा करना आसान तो नही है फिर मैं कोशिश करूंगी,  अगर मुझसे कोई भूल हो जाये तो क्षमा करियेगा ।

फिल्म हिन्दी मीडियम हमारे समाज की सच्चाई पर आधारित है, इस फिल्म में एक ऐसे अभिभावक को दिखाया गया है जो हमारे बीच से ही है, वो अभिवावक जो अपने बच्चे की अच्छी शिक्षा के लिये किसी भी हद तक जा सकता है।

फिल्म में इरफान सर और उनकी पत्नी दोनों अपनी बेटी को शहर के सबसे अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाना चाहते थे और इसके लिये उन्होंने हर सम्भव प्रयास भी किया। अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाने के लिये, स्कूल की जो भी उल्टी सीधी मांग थी वो पूरी की......स्कूल के पास अपना घर लिया,  ऊंची सोसाइटी के लोगों से मेलजोल बढ़ाया,  स्कूल के एडमीशन फार्म को लेने के लिये रात भर लाइन में लगे लेकिन उनके हाथ असफलता ही लगी । बच्चे के दाखिले का दबाव बच्चे से ज्यादा उसके माता-पिता पर हावी था । इस फिल्म में यह दिखाया गया है कि इरफान सर जो अच्छे खासे अमीर आदमी थे फिर भी उनकी बेटी का एडमीशन उस अच्छे स्कूल में नहीं हुआ क्योंकि वो एक व्यवसायी थे और उन्होंने बहुत अधिक शिक्षा नहीं प्राप्त की थी । मुझे यह समझ नहीं आता कि बच्चे के अच्छे स्कूल में दाखिला लेने के लिये यह क्यों आवश्यक है कि उसके माता-पिता बहुत अधिक पढ़े लिखे हों या उनके साक्षात्कार पर निर्धारित किया जाये कि बच्चे का दाखिला होगा या नहीं । यह शिक्षा देने का कैसा मापदंड है , अच्छा है जो यह मापदंड पहले नहीं था नहीं तो हमारे देश को अब्दुल कलाम जैसे वैज्ञानिक कभी प्राप्त नहीं होते। जब एक अमीर आदमी अपनी बच्ची के दाखिले के लिये इतना परेशान है तो सोचिये मध्यम वर्ग का क्या हाल होगा ।

हाँ तो फिल्म में इरफान सर की लाख कोशिश करने पर भी जब उन्हें सफलता नहीं मिली और उनकी पत्नी का दवाब बढ़ता जा रहा था तो उन्होंनें एक गलत मार्ग को चुन लिया जो शायद आज भी हमारे समाज के कई परिवार अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिये चुन लेते हैं , वो था एक गरीब का हिस्सा मारने वाला मार्ग...... हालाकि यह मार्ग उन्हें सही नहीं लग रहा था , उनकी आत्मा कचोट रही थी लेकिन बच्चे के लिये वो इसे अनदेखा कर गये । अच्छे स्कू्ल में गरीब बच्चों की कुछ सीटें आरक्षित होती हैैं और अमीर वर्ग के अनुसार गरीब बच्चे वहाँ पढ़ने योग्य नहीं होते हैैं इसलिए वो बेइमानी करके गरीब बच्चोंं की वह सीट हडप लेेेते हैं । फिल्म मेें इरफान सर ने भी कुछ ऐसा ही किया लेकिन स्कूल के नियमों की सख्ती के कारण उन्हें सच मेें गरीब बनना पड़ा क्योंकि स्कूल वालों को संदेह हो गया था । इरफान सर को एक महीने के लिये गरीबों की बस्ती में रहना पड़़ा जहां उन्होंने समझा कि गरीब सिर्फ पैसे से कमजोर होता है,  दिल से तो वो करोड़पति होता है । इरफान सर और उनकी पत्नी की आत्मा उन्हें रोज कचोटती कि वो गलत कर रहे हैं लेकिन बच्चे के लिये वो अपनी आत्मा की बात नहीं सुनते थे और आखिरकार उनकी बेटी को उनकेे  झूठे नाटक की बदौलत उस अच्छे स्कूल मेें एडमीशन मिल ही गया लेकिन एक गरीब मजदूूूर जो उनका बहुत अच्छा  दोस्त बन चुका था उसके बच्चे को दाखिला नही मिल सका । इरफान सर को लगने लगा कि उन्होंने एक गरीब का हक मार दिया है और इस बात ने उनकी नींद,  चैन और सुकून सब छीन लिया । प्रायश्चित के लिये उन्होंने शहर के सरकारी स्कूल जहां गरीबों के बच्चे पढ़ते थे वहाँ की काया पलट करवा दी लेकिन अभी भी उनकी आत्मा को सुकून नही था क्योंकि बच्चे के दाखिले के लिये उन्होंने जो पाप किया था वो उन्हें जीने नहीं दे रहा था और इसके लिये उन्होंने स्कूल की प्रधानाचार्य से बात करनी चाही लेकिन वहां जाकर उन्हें एक और कड़वी सच्चाई से रुबरू होना पड़ा जब उन्हें पता चला कि यह गोरखधन्धा स्कूल वाले खुद ही करते हैं जिससे वो अधिक पैसे कमा सकें और साथ में उनकी श्वेत छवि बरकरार रहे । इरफान सर ने स्कूल की प्रधानाचार्य का राज सबके सामने खोला और साथ में अपनी बेटी को वहाँ से निकालकर उसी सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजा जहां गरीबों के बच्चे पढ़ने जाते थे, वो समझ गये थे कि बच्चों की प्रतिभा को कोई भी दीवार नहीं रोक पायेगी,  और इसके लिये उसे अच्छे स्कूल से ज्यादा अच्छी शिक्षा की जरुरत है जो सरकारी स्कूल में भी मिल सकती है । 

आजकल माता-पिता के मन में यह बात बैठ गयी है कि अच्छे स्कूल वही होते हैं जहां बहुत अधिक फीस ली जाती है और उसका फायदा यह स्कूल वाले भरपूर उठाते हैं और इसी वजह से सरकारी स्कूलो की हालत खराब होती जा रही है क्योंकि कोई भी वहां पढ़ना नहीं चाहता है। बच्चे के दाखिले के लिए माता-पिता को इतना अधिक तनाव हो जाता है कि कई बार यह समझ नहीं आता है कि पढ़ना किसे है ? दोस्तों इस कहानी की समीक्षा के माध्यम से मैं बस एक ही बात कहना चाहूँगी कि बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का प्रयास करें लेकिन किसी दबाव में आकर नहीं बल्कि खुश होकर जिससे आगे चलकर बच्चे भी किसी दबाव को महसूस न करें ।

स्वाति शुक्ला

#फिल्मीतड़का

#जुलाईब्लागचैलेंज

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