जब मैं गई मम्मी पापा के साथ पहली बार नैनीताल

जब मैं गई मम्मी पापा के साथ पहली बार नैनीताल

कहते हैं न कुछ किस्से,कुछ लम्हे,कुछ बातें आपके जीवन पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं और जिसे आप जिंदगी भर नही भूल पाते ।ऐसे ही मेरे जीवन की पहली यात्रा मेरे मम्मी पापा और बहनों के साथ ।बहुत ही रोमांचक बहुत ही अनूठी।तो बांट रही हूँ आप सबके साथ वो कुछ सुनहरी खूबसूरत यादें नैनीताल डायरी से।

तब मैं नवीं क्लास से टैन्थ में आई थी।गर्मी की छुट्टियां चल रहीं थी ।हर बार की तरह इस बार भी तैयारी हो रही थी नानी के घर जाने की।मम्मी नही जाती थीं पर हम चार भाई बहन में से दो को भेज देती थीं ताकि यहाँ दादी के  यहाँ मम्मी के काम का बोझ कुछ कम हो जाये। 
उस समय मेरे पापा लायंसक्लब संस्था के प्रेसीडेन्ट थे।वैसे आउट ऑफ सिटी मीटिंग  इग्नोर करते थे अपने बिजनैस की वजह से।पर उस बार पापा ने प्रोग्राम बनाया  तीन दिन  के लिये नैनीताल जाने का।हमे लगा मम्मी पापा ही जायेंगे ।इसलिए किसी का कोई रिएक्शन नही ।पर जैसे ही पापा ने कहा कि फैमिली के साथ जाना है  सच में आज भी वह अनोखी खुशी महसूस कर पाती हूँ मैं।उसका कारण यह भी था कि हम बहुत छोटे से कस्बे मे रहते थे(हालांकि अब तो बहुत बदलाव आ गया है शायद मेरी कुछ सखियां जानती हों उत्तर प्रदेश का जिला फरूर्खाबाद का तहसील कायमगंज  ,तम्बाकू की कुटाई और आलू  के उत्पादन के लिये मशहूर है) और पापा अपने बिजनैस की वजह से कहीं नही जा पाते थे ।हमारा उस समय घूमना बस नानी के घर तक सीमित था और मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि मेरी मम्मी दिल्ली से हैं। तो बस जैसी ही हम तीनो बहनों को पता लगा कि हम सब भी जा रहे हैं तो हमने लगानी शुरू कर दी अपनी अटैची ।जितनी नई ड्रैस हो सकती थीं वह और अपने नये पुराने सुन्दर सुन्दर हेयर बैंडस।
हम तीन फैमिली कायमगंज से जा रहे थे ।लाॅयन डॉ वीडी शर्मा अंकल, लॉयन माहेश्वरी अंकल और मेरे पापा लॉयन श्री सुधीर कुमार रस्तोगी ।सभी अपने परिवार के साथ थे।
 हम कायमगंज से सुबह निकले थे और शाम ढलते ढलते हल्दवानी के कटाव घुमावदार रस्तों  से हमारी मैटाडोर सरपट दौड़ती जा रही थी।  वाह कितनी उमंग,कितना उत्साह और कितना खुशनुमा माहौल था उस मैटडोर का जिसमे मैं और दोनो अंकल की बड़ी बेटियाँ और छोटे बच्चे थे ।आगे की सीट पर माहेश्वरी अंकल थे जो कि बार बार सो रहे थे।फिर शुरू हुईं हम लड़कियों की लड़कियों वाली बातें ! 
सबसे मजेदार किस्सा ये हुआ कि जब हमारी मैटाडोर कटाव घुमावदार पहाड़ी सड़कों से ऊपर की ओर बढती जा रही थी तो वहाँ जल रहे बल्ब, रोशनी टिमटिमाते तारे से लग रहे थे चूकि पहली ,,,,बिल्कुल पहली बार पठारी से पहाड़ी इलाका देखा था तो मैने उत्सुकता वश  ग्रुप में सबसे बड़ी प्रिया दीदी से पूछा -दीदी ये तारे हैं,,,? वह भी पता नही क्या समझीं और खिड़की से बाहर झांकते हुए बोली हाँ हम तारों के बहहहहुत पास हैं !बहुत ऊँचाई पर हैं हम लोग ! ही ही ही ,,,,,वह अल्हड़पन कहो या बालमन आज भी सोंचकर  हस लेती हूँ मैं।
बस ऊपर पहुँच कर ,,मालरोड  के सामने बहती झील ,,,इधर उधर पहाड़ों के ऊपर बसे घर और उनमे टिमटिमाती,झिलमिलाती रोशनी और झील में उनका प्रतिबिम्ब,,,,,,इतना सुन्दर दृश्य पहली बार देखा था ।वह अनुभूति ,प्रफुल्लता ,एहसास अलग ही था।हांलाकि अभी पिछले साल भी हम नैनीताल गये पर वह स्वर्णिम एहसास आज तक नही हुआ।उस समय की बेबाकी,मन का अल्हड़पन न कोई फिक्र न चिंता बस उत्सुकताऔर रोमांच। 
 
अगले दिन सुबह हम सबने  निश्चित जगह पर मीटिंग अटैंड की और ढलती दोपहर तक वहाँ से फ्री होकर बोटिंग की व नैना देवी जी के मन्दिर में दर्शन किये।अगले दिन "रानी खेत" होते हुए "मुकुटेश्वर महादेव" मंदिर गये।
तीसरे दिन हमारी वापसी थी।इस ट्रिप में मैं नए रिश्तों में बंधी।वीडी शर्मा अंकल की बेटी प्रिया व माहेश्वरी अंकल की बेटी "मिली" मेरी दीदियां बन गईं।हर साल हम ऐसे ही ट्रिप जरूर बनायेंगे के वादे के साथ भीनी यादें लेकर हम कायमगंज अपने घर पहुंच गये। नैनीताल , मम्मी पापा और बहनों के साथ घूमने का वह रोमांच तस्वीरों को देखकर आज भी वैसा ही है।
आप भी शेयर कीजिये द पिंक कॉमरेड पर अपने कुछ ऐसे अनुभव।
धन्यवाद।

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