जलियाँवाला बाग:कुछ अनसुने तथ्य

बचपन से ही हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक लोमहर्षक अध्याय "जलियांवाला बाग " के बारे में सुनती आ रही हूं। पर पिछले कुछ दिनों से इसके बारे में इतना पढ़ा कि मेरे दिलोदिमाग में करीब 102 वर्ष पूर्व 13 अप्रैल 1919 को बैशाखी जैसे पावन पर्व के दिन हुई ये खौफनाक घटना चलचित्र की भाँति चलने लगी और कुछ अनसुने से तथ्य भी पता चले।कितना निर्मम होगा वो शख्स जो मात्र लोगो में अपने शासन के प्रति डर बैठाने और विरोध को दबाने के लिए 1000 से ज्यादा लोगों की जान ले सकता है। उस क्रूर शख्स ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर  ने घटना के बाद हुई जांच में तो यहाँ तक स्वीकार किया था कि वह दो तोप भी लेकर गया था।किंतु मार्ग संकरा होने के कारण वह अपने इस खौफनाक इरादे में कामयाब न हो पाया। मुख्यालय वापस पहुँच कर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर की मक्कारी देखिए उस ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को टेलीग्राम किया कि उस पर भारतीयों की एक फ़ौज ने हमला किया था जिससे बचने के लिए उसको गोलियाँ चलानी पड़ी। ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर "मायकल ओ डायर "ने इसके उत्तर में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को टेलीग्राम किया कि तुमने सही कदम उठाया। मैं तुम्हारे निर्णय को अनुमोदित करता हूँ। फिर ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डवायर ने अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में मार्शल लॉ लगाने की माँग की जिसे वायसरॉय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड नें स्वीकृत कर दिया।इस हत्याकाण्ड की विश्वव्यापी निंदा हुई जिसके दबाव में भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट एडविन मॉण्टेगू ने 1919 के अंत में इसकी जाँच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया ।1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफ़ा देना पड़ा। 1927 में प्राकृतिक कारणों से उसकी मृत्यु हुई। जी हाँ रेजीनॉल्ड डायर की मृत्यु उसकी बीमारी के कारण हुई। जैसा कि लोक प्रचलित है कि क्रांतिकारी उधम सिंह ने उसकी हत्या की.. पर तथ्य कुछ यूं है किउस दिन जलियांवाला बाग नरसंहार के समय उपस्थित 20 वर्षीय उधम सिंह ने शपथ ली कि वह जनरल रेजीनॉल्ड डायर से इस क्रूरता का बदला अवश्य लेगा। और इसके लिए वह उसके पीछे इंग्लैंड तक गया ।उधम सिंह के लंदन पहुंचने से पहले जनरल डायर अपने कर्मों की सजा पाते हुए बीमारी के चलते मर गया था।ऐसे में उन्होंने अपना पूरा ध्यान  पंजाब का गवर्नर  रहा माइकल ओ’ ड्वायर को मारने पर लगाया ।क्योंकि उधम सिंहजानते थे कि "जलियाँवाला बाग़ कांड" के षड़यंत्र में वो भी शामिल था और जैसे कि ऊपर मैंने बताया कि उसने जनरल आर डायर के कृत्य को समर्थन भी दिया था।तो 13 मार्च 1940 को उधम सिंह ने माइकल ओ’ ड्वायर को लंदन के काक्सटन हॉल में गोलियों से भुन दिया।उसी पल उसकी मौत हो गयी।और हिंदुस्तान के वीर सिपाही ने हजारों निर्दोष मौतों का बदला लिया और ये संदेश भी दिया कि अब भारत अत्याचार सहन नही करेगा।31 जुलाई, 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह उधम सिंह भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में अमर हो गए।

#जलियाँवाला बाग़

आभार:गूगल

प्रियंका फुलोरिया

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