जो बोया पेड़ बबूल का

जो बोया पेड़ बबूल का

अनु जी के कानों में जैसे कोई सीसा  उड़ेल रहा था , उनकी 2 महीने पहले आई बहू कह रही थी " मैं नहीं करूंगी तीज की पूजा मेरे मैयके में यह पूजा नहीं होती "।

"आप भी तो मांजी अपने मैयके की ही सब रीत रिवाज करती हैं आप कौन सा ससुराल की नीति मानती हैं, जो मुझ पर दबाव बना रही है।"

अनु जी के मस्तिष्क में दो दृश्य चलचित्र की तरह घूम गए।
पहला जब वह छठी कक्षा में थी और हिंदी की अध्यापिका ने अर्थ पूछा था , इस मुहावरे का "जो बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय" उन्होंने तुरंत हाथ उठाकर उत्तर बताया था।
अध्यापिका ने शाबाशी के साथ कहा था " इसे जीवन में भी उतारना " ।
शायद ही हम इन  लोकोक्तियों में छिपी गहरी बातें जीवन में उतारते है।

फिर 48 साल पहले का दृश्य जब वह पहली बार अपनी ससुराल गई थी। गांव में थी उनकी ससुराल और अनु जी व राकेश ने प्रेम विवाह किया था, सो ससुराल से कोई शामिल नहीं हुआ था। राकेश ने सोचा बाद में सब को मना लेंगे। अनु जी शहरी परिवेश में पली बढ़ी थी ।

गांव तो ठहरे गांव, न बिजली न सड़कें और घुंघट करना था सो अलग। उसी रात उन्होंने राकेश जी से कहा "अब कभी दुबारा मुझे गांव आने को मत कहना, तुम ही हो आना और मिल आना अपने बाऊ जी व, अम्मा जी से"।

राकेश जी ने भी न दोबारा उनसे जिद् की  ना उन्होंने कोई रुचि दिखाई। राकेश जी के बड़े भाई -भाभी ने ही मां -बाबूजी की देखभाल की। अनु जी ने रीति-रिवाज सब जो मैयके के देखे थे वही किए।
सास कभी कभार आती तो मुंह में ताला डाल उसकी गृहस्थी देखती ।
हां ! राकेश बराबर गांव में अपना हिस्सा लेने के लिए हाजिर हो जाते ,जो मां-बाप उन्हें खुशी खुशी दे देते।
ऐसे ही कब मां- बाबूजी दुनिया से विदा हो गए पता ही नहीं चला ,उस समय भी अनु जी बच्चों के इम्तिहान का बहाना बनाकर नहीं पहुंची, राकेश ही गए।

एक झटके से अनु जी वर्तमान में धम्म से गिरी पलंग पर। उन्होंने पहले पानी पिया , फिर अपने मन को शांत किया।
वह धीरे से अपनी बहू के कमरे में पहुंची और उसे प्यार से गले लगा लिया। फिर कहा " बहू तुम सच कह रही हो और बिल्कुल सही हो"
परंतु , यही बातें तुम्हें ना सुननी पड़े अपनी बहू से,  इसलिए यह व्रत करना होगा "।
यही संस्कृति व रीति रिवाज हमारी पहचान है हमें इन्हें अगली पीढ़ी को देना होगा नहीं तो हम अपनी विशिष्ट पहचान खो देंगे।

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