बेहतर ज़िंदगी के लिए पापड़ तो बेलने ही पड़ते हैं

महिलाओं के लिए एक गर्व की बात है। किताबी जानकारी होना, पढ़ा लिखा होना ज़रूरी नहीं है , ज़रूरी है मेहनत करना, लगन और जज़्बे से काम करना।

बेहतर ज़िंदगी के लिए पापड़ तो बेलने ही पड़ते हैं

आपने यह मुहावरा तो सुना ही होगा 'पापड़ बेलना' 

जी हाँ…... जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं । ज्योति नाईक ने यह सिद्ध कर ही दिया कि मेहनत और लगन से जीवन को बेहतर और कामयाब बनाया जा सकता है।

शायद याद आ गई होगी आपको वह है ऐड - खरगोश के साथ - लिज्जत पापड़ कुर्रम कुर्रम ।

1959 में मुंबई में सात निरक्षर महिलाओं ने एक कंपनी खोलने की सोची । कंपनी भी किस चीज की - पापड़ की और फिर पापड़ का नाम भी रख दिया गया 'लिज्जत पापड़' लेकिन …...

लिज्जत पापड़ की कंपनी तो बना लें लेकिन पैसा कहाँ से आए और फिर 80 रुपए उधार लिए और शुरू हो गया -लिज्जत पापड़ ।

धीरे-धीरे हर कोई इसका दीवाना हो गया । भारतीय रसोई का एक लोकप्रिय ब्रांड - लिज्जत पापड़ । भारत के कोने-कोने में इसकी शाखाएँ हैं , जहां महिलाएँ काम करती है और हैरान रह जाएंगे आप यह जानकर कि लिज्जत पापड़ कंपनी की आय पाँच अरब रुपये से भी ज्यादा है । 

लिज्जत ग्रुप अब सिर्फ पापड़ ही नहीं बनाता बल्कि उसके ब्रांड से अब आटा , मसाले और साबुन जैसी चीज़ें भी निकल रही हैं और दुनिया भर में प्रयोग की जा रही हैं । 

लिज्जत पापड में काम करना, इस संस्था से जुड़ना महिलाओं के लिए एक गर्व की बात है। किताबी जानकारी होना, पढ़ा लिखा होना ज़रूरी नहीं है , ज़रूरी है मेहनत करना, लगन और जज़्बे से काम करना। ज्योति नाईक 10 साल से लिज्जत पापड़ की अध्यक्ष हैं, वैसे पैंतीस साल उनको भी लिज्जत पापड़ के साथ हो गए हैं । उनके विचार से लिज्जत पापड़ छोटे से भारत की तरह है...एक ऐसी जगह जहाँ धर्म, भाषा या समुदाय महत्वपूर्ण नहीं है, सिर्फ एक जैसे मूल्य. सभी बहनें मालिक भी हैं और जो भी छोटे या बड़े फैसले किए जाते हैं उनमें सबकी सहमति होती है।

पापड़ कैसे बनाते हैं, उसको कैसे सुखाया जाता हैं, बेहतरीन क्वालिटी और स्वाद लाने के लिए क्या क्या ज़रूरी है, ये सब महिलाओं को सिखाया जाता है ताकि ये सब वे अपने ही घर में कर पाए और उनके परिवारों को मदद मिले। सोच यह है कि हर एक महिला में योगदान देने की क्षमता का विकास हो। घरेलू ज़िम्मेदारियाँ निभाने का समय भी महिलाओं को दिया जाता है । उन पर घर की चक्की में पिसने की तोहमत नहीं लगाई जाती , उनकी भी भूमिका तय कर दी जाती है । ऐसे में वे खुद फैसला कर सकती हैं कि वे पापड़ कब बनाएँ ।

जो महिलाएं पापड़ घर में नहीं तैयार कर सकतीं हैं, वे उनकी पैकिंग में मदद कर सकती हैं। पापड़ों को एक डिब्बे में रखा जाता है, हर एक डिब्बे में करीब 14 किलो पापड़ डाले जाते हैं । ये डिब्बे ख़ास डिस्ट्रीब्यूटरों को दिए जाते हैं । महिला कर्मचारियों को भी हर दिन अपने काम के लिए पैसा मिलता है ।

ज्योति नाईक का कहना है कि ऐसे में वे खुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाती हैं. खुद को अलग नज़रिए से देखने लगती हैं । आत्मविश्वास पाने के लिए इससे बेहतर भला और क्या हो सकता है। 

तो देखा आपने आत्मविश्वास और हौंसला पाने और ज़िंदगी को संवारने के लिए इस तरह से भी पापड़ बेलने पड़ते हैं. काम मेहनत , कला और हुनर का है. आपके खाने के वक़्त पापड़ अगर साथ हो तो जान लें कि उसकी क्रिस्पी आवाज़ में इन महिलाओं को हासिल खुशी फूट रही है, ये उनकी खुशी का ही स्वाद है।

आपकी मेहनत और लगन आपको उस शिखर तक ले जाती है जोकि कल तक केवल आपके ख्वाबों में ही नजर आता था और फिर यह भी सत्य है कि कामयाबी के लिए पापड़ तो बेलने ही पड़ते हैं।

मधु धीमान

पिंक कॉलमनिस्ट-हरियाणा



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