कहां है मेरा संसार??

कहां है मेरा संसार??

अखबार के पन्नों पर हर दिन कोई ना कोई घरेलू हिंसा , दहेज उत्पीड़न, नवविवाहिता की हत्या से संबंधित कोई ना कोई खबर अवश्य होती है। कुछ भौतिक साधनों के लालची इस तरह का घृणित अपराध को करने से नहीं डरते। किसी की नाज़ो से  पली हुई बेटी को शारीरिक प्रताड़ना देने से नहीं डरते। जो अपना बाबुल का घर आंगन छोड़, किसी अनजान के घर मे बिना हिचकिचाहट प्रवेश करती है ,फिर से अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करती है ,उससे पहले ही दिन ताने सुनने को, सलीके सीखने को मिलने लगते हैं।

मायका कन्यादान होते ही पराया हो जाता है और ससुराल जिंदगी भर उस को अपना नहीं हो पाता। ससुराल वाले उसे कई तरीके से आज़मा कर भी पूरी तरीके से नहीं अपना पाते। और वह नई संसार के लिए एक पल में अपना सर्वस्व निछावर कर कर देती है अगर उसे अपनापन नहीं मिलता है तो उसके दिल से शायद यही दर्द टपकेगा__

चूड़ी भरी कलाईयों से, मेहंदी रचे हाथों से,

चावल भरी मुट्ठी को, तेरे आंगन में जब मैंने छोड़ा

पराया  हुआ आंगन तेरा(मां)

सोचा था, अब मैं अपने घर चली,

सबको बनाऊंगी अपना,

हाथों से सजाऊंगी घर अपना,

पर मां, यह जिंदगी के कौन से मोड़ पर आकर खड़ी,

यहां पर भी मैं अपना घर- संसार न पा पाईं,

तानों से हुई यहां पर मेरी मुंह दिखाई,

झूठे इल्जाम से बनाई है मेरी परछाई,

रिश्ते -नाते सब यहां के खोटे,

यहां सब, एक से बढ़कर एक झूठे,

कभी जो मैं तेरी नंदनी थी,

अब बस बनकर रह गई हूं निंदनीय मैं,

अपनी बेटी के छुपाते हैं हर राज,

तेरी बेटी पर लगाते हैं भर -भर के इल्ज़ाम,

यह कैसा है रिवाज,

तेरी कोख में ही था, मां! मेरा अपना संसार।।

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