काठ की हांडी एक ही बार चढ़ती है

काठ की हांडी एक ही बार चढ़ती है

नीलम खुश थी बहुत अपनी देवरानी को पाकर, हमेशा से उसे एक छोटी बहन की कमी खलती थी लेकिन अब लगता था कि उसकी देवरानी के रूप मे बहन मिल गयी थी। 

देवर ने प्रेम विवाह किया था कॉलेज मे मिले थे दोनो। घर वाले उनकी शादी के खिलाफ थे, घर वालों को नीलम की तरह खानदानी ,संस्कारी और घरेलू लड़की चाहिए थी, लेकिन उल्टे सीधे झूठ बोलकर किसी तरह से शादी तो हो गयी लेकिन देवरानी को कोई पसंद नही करता था घर मे, सिवाय नीलम के। नीलम हमेशा एक बड़ी बहन की तरह उसको कुछ न कुछ सिखाती रहती, घर के तौर तरीके, रहन सहन, स्वभाव सबके बारे मे बताती।देवरानी अपने मायके मे अकेली थी, हॉस्टल का रहना, बड़े शहरों की लाइफ स्टाइल ने उसे बहुत तेज़ और मतलबी बना दिया था। उसको परिवार का मतलब ही नही पता था।इसलिए थोड़े ही दिनों मे उसे घर मे ऊबन सी होने लगी। 

अब उसका एक ही मकसद था कि घर से अलग होकर कहीं और रहना। जहाँ वो देवर के साथ रहकर अपनी मन के मुताबिक रह सके। सो उसने देवर के कान भरने शुरू कर दिये और ये जताती कि यहाँ उसे कोई पसंद नही करता चाहे वो दीदी (जेठानी) हों या माँजी। देवर भी उसकी बातों मे आकर अलग होने का निर्णय कर लेता है।

नीलम को पता चलता है तो वो देवरानी को समझाती है। 

" तुम मेरी छोटी बहन जैसी हो, मैंने कभी तुमसे गलत व्यवहार नहीं किया और घर मे सभी लोग तुम्हे अपना ही लेंगे। लेकिन अगर तुम घर तोड़ कर खुश रह लोगी तो ये तुम्हारी भूल है, काठ की हांडी एकबार ही चढ़ती है, देवर जी के सामने सबको गलत बना के तुम भी चैन से

नहीं रह पाओगी। इसलिए इन सब फालतू बातों की बजाए ये सोचो कि सबका दिल कैसे जीता जाए".ये घर है यहाँ तुम जितना प्यार दोगी उतना तुम्हे वापस भी मिलेगा "।

देवरानी नीलम को बड़े ध्यान से सुन रही थी शायद पहली बार। 

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