किस्सा -ए- टेबल

किस्सा -ए- टेबल

सूरत शहर से जुड़ी मेरी बहुत सी ऐसी यादें हैं,जो जब भी याद आती हैं होठों पे एक हल्की सी मुस्कान छोड़ जाती हैं।

कुछ वर्ष पहले की बात है,दिवाली का पर्व आने वाला था सोचा इस बार अपना पुराना सोफ़ा बेचकर नया ले लेंगे क्योंकि उसकी लकड़ी में दीमक लग चुका था lजब सोफ़ा लिया था तब दुकानदार ने हमसे जमकर पैसे लिए थे यह कहकर, कि ये तो सागवान का है l
पुराना सोफा औने पौने दाम में बेच दिया lअब नया सोफा ख़रीदने की तलाश शुरू हो गईं ।तलाश करते करते आख़िर हमें एक ऐसी फ़र्निचर की शॉप मिल ही गई,जहाँ हमें सोफा पसंद आ गया lयानी डिजाइन भी हमारी पसंद का और रेट भी हमारी बजट के अंदर थाl हमने दुकानदार से कहा,आज ही घर पर सोफ़ा पहुँचा दे l वह बोला -"ये तो हमारे डिस्प्ले के लिए है,ऐसा दूसरा बनाना पड़ेगा,१५ दिन लग जाएंगे l१५ दिन सुनते ही मेरा दिमाग चकरा गया,मैने  कहा-"भैया थोड़ा जल्दी नहीं हो सकता,दिवाली भी आने वाली है और कोई मेहमान आ जाता है तो बड़ी मुश्किल होती है " मेरी बात सुनकर वह बोला-"ठीक है ऑन्टी जी,आपके लिए हम जल्दी बना देंगे फिर भी एक सप्ताह तो लग ही जाएगा।मरता क्या न करता,हमने ओके कर दिया lअब बारी थी टेबल पसन्द करने कीl दुकानदार ने हमें बहुत सी टेबल दिखाई जो बोर्ड की बनी थीं lहमने कहा हमें तो वुडेन टेबल चाहिए,जिसके ऊपर ग्लास टॉप लगा होl उसने कहा, आजकल ये ही चल रहीं हैं lपर आप कहेंगे तो हम लकड़ी की बना देंगेl आप डिजाइन पसंद करके बता देंlहमने एक टेबल का डिजाइन पसंद करके बता दिया l
अब उलटी गिनती शुरू हो गई lएक-एक दिन सोफ़े की इंतज़ार में गुजरने लगा l एक सप्ताह कब गुज़र गया,मालूम ही नहीं पड़ा।सोफेवाले का फोन आया,वह बोला सोफाा रेडी है भेज रहा हूँ।" मैने  पूछा-"भैया टेबल जैसी कही थी,वैसी ही बनाई है ना " बोला-"जी मैडम।" मैं  बेसब्री से इंतजार करने लगी lआधा घंटा बीत गया तब डोर बेल बजी l उत्साहपूर्वक दरवाजा खोला lतीन लोग सोफा लेकर आए और अंदर रख दिया lबाद में उनमे से दो आदमी नीचे गए और टेबल लेकर आए l टेबल देखकर ,मेरे मुँह से एकदम निकला-"भैया ये हमारी टेबल नहीं है,हमने तो लकड़ी की बनवाई थी ये तो बोर्ड की बनी है,साइज़ में भी छोटी है।" एक आदमी बोला-"जी मेडम,मालूम है ये टेबल आपकी नहीं है पर आपको सोफा जल्दी चाहिए था,और टेबल अभी बनी नहीं थी इसलिए सेठ ने दूसरी भेज दी lजैसे ही आपकी टेबल बन जाएगी,ये ले जायेंगे ओर आपकी दे जाएँग़े।" मैने दुकानदार को फोन किया और पूछा,भैया हमारी टेबल कब बनेगी? ये वाली तो बोर्ड की है,बिलकुल अच्छी नहीं लग रही है।वो बोला-"अरे आंटी जी चिंता ना करो,कारीगर छुट्टी पर चला गया था इसलिए टेबल की पोलिश का काम रह गया था lबस कारीगर के आते ही आपकी टेबल भेज दूँगा lआप बचा हुआ पेमेंट इनको दे दीजिए।" मैने उन लोगों से बिल ले लिया,सोचा टेबल के पैसे अभी नहीं देती,इससे उनपर दबाव बना रहेगा पर बेटे ने कहा-"माँ अच्छा नहीं लगता,एक तो उसने आपका सोफा समय से पहले बनाकर भेज दिया और क्या चाहिए,दूसरा परेशानी ना हो इसलिए दूसरी टेबल भेज दी "बेटे की बात मानकर मेने पूरा पेमेंट कर दिया l

एक सप्ताह बीत गया जब दुकानदार का कोई फोन नहीं आया तो मैने ही उसको फोन लगाया,पूछा-"क्या हुआ भैया अभी तक टेबल नहीं बनी।" बोला-"बस आंटी जी कल शाम तक पहुँच जाएगी।"
दूसरा दिन भी बीत गया lअब तो बस में फोन करके पूछती-"कब आएगी?" उधर से जवाब मिलता-"बस कल पहुँच जाएगी।" ये सिलसिला लगभग एक महीना चलता रहा lअब तो दुकानवाले ने फोन ही स्विच ऑफ  करके रख दिया lअब मुझे सब समझ आ गया था, कि दुकानदार हमारे साथ चिटिंग कर रहा है lउसने कोई लकड़ी की टेबल नहीं बनाई थी,क्योंकि वो महँगी पड़ती है l हमें  बोर्ड वाली टेबल,जो दिखने में लकड़ी जैसी लगती है,पर सस्ती होती है दे दी थी l

मेने भी दुकानवाले को सबक सिखाने की ठान ली lबेटे को साथ लेकर उसकी दुकान पर पहुँच गई lपहले तो वह हमें देखकर थोड़ा सा आश्चर्यचकित हुआ,क्योंकि उसने ये सोचा नहीं था कि हम दुकान पर आ जाएँगे lफिर खीसे नीपोरते हुए बोला-"अरे आंटी जी आइए,बैठिए।" मैने ग़ुस्से से कहा-"हम बैठने नहीं आएं हैं,अपनी टेबल लेने आऐं हैं lएक महीने से हमें आप बेवकूफ  बना रहें हैं lअब तो फोन भी नहीं उठाते .इतना बड़ा शोरूम खोलकर बैठे है.कैसे चलाते हैं?" मुझे चिल्लाते देखकर दुकान में खड़े लोग दुकानवाले की तरफ देखने लगेl अपनी साख पर बनते देख बोला-"बस कारखाने में है,अभी मंगवाता हूँ lआप थोड़ा इंतजार करें।" ऐसा कहकर किसी नौकर को क्या इशारा किया मालूम नहीं,उस समय वो इतनी तेजी से दुकान के बाहर चला गया,ताकि सबको लगे वो कारखाने गया है lइतनी देर में ये भाई अपने ग्राहकों से ऐसे हँस-हँसकर बातें कर रहा था,जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो lथोड़ी देर में वो नौकर लौट आया ओर बोला-"साहिब कारखाने की चाबी तो दूसरे कारीगर के पास है ,वो तो छुट्टी पर है।"अब तो हमारा शक यकीन में बदल गया lटेबल बनी ही नहीं थी l मैने कहा -"बस भैया बहुत हो गया,हम तो आज टेबल लेकर ही जाएँगे"lएक टेबल की ओर इशारा करके कहा,हमें ये वाली देदो,कारखाने वाली आप रख लेना।"मेरा इतना कहना ही था,कि वो बिगड़ गया,कहने लगा-"मेडम ये तो महँगी है,कैसे दे सकते हैं? इसके लिए आपको एक्स्ट्रा देना पड़ेगा।" मैने गुस्से से कहा-"और जो घटिया टेबल तुमने हमें चेपी है,उसका क्या?इतने फोन किए,उसके पैसे कौन देगा?" मुझे चिल्लाते देखकर बेटा धीरे से बोला-'माँ चुप हो जाओ,सब देख रहें हैं। " तो मैंने उसको भी डाँट दिया  -"उस दिन अगर इसके पैसे रोक लेते,तो आज इसकी नौबत ही नहीं आती।" दुकानदार मुझे चिल्लाते देखकर बोला-"ठीक है मेडम ये टेबल ले जाइए,पर ग्लास के एक्स्ट्रा पैसे देने पड़ेंगे,इसमें मोटा ग्लास लगा है।" "एक्स्ट्रा तो क्या,एक पैसा भी नहीं दूँगी,जल्दी से अपना टेम्पा बुलाओ हमें देर हो रही है" वो लपककर बोला-"आंटी जी उसको आने में एक घंटा लगेगा" मैंने कहा-"ठीक है, हम इंतज़ार कर लेंगे" एक घंटे बाद टेम्पा आया,उसमें टेबल रखवाई और उसमे ही बैठकर घर आए l
आज भी वो दिन याद आता है,तो हँसी भी आती है और गुस्सा भी l कभी कभी टेड़े लोगों के साथ टेड़ा बनना पड़ता है,नहीं तो ये सीधे लोगों को मूर्ख बनाकर ठगते रहते हैं l

#मेरेशहरसेजुड़ीमेरीयादें

कमलेश आहूजा

मुम्ष्ट्र्ट््ष्ट्र्ट्ष्ट्र्््ष््ष्ट्र्ट््ष्ट्र्ट्ष्ट्र्््ष

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