क्या दामाद के पैर पूजने और छोटी ननद के पैर छूने की प्रथा सही है ?

क्या दामाद के पैर पूजने और छोटी ननद के पैर छूने की प्रथा सही है ?

इस बार पिंक चर्चा का विषय था ..

परम्पराओं  के नाम पर बड़ों का छोटों के पैर छूना  क्या सही है? क्या यह परम्पराएं बंद होनी चाहिए ? आपके यहां भी कोई ऐसी प्रथा है तो हमें बताइए और इन परम्पराओं को किस तरह बंद किया जा सकता है ?कोई सुझाव हो तो वह भी दीजिए ।

जानिए पिंक कॉमरेड के जवाब 

यास्मीन अली 

सम्मान तो दिल से होता है , रढ़िगत परम्पराओं का निर्वहन करने के लिए बाध्य करना व्यक्ति विशेष की स्वतंत्रता में बाधा डालना ही है।इनका खंडन नहीं करो तो यह समस्या बन जाती है, और उसको ढोना मजबूरी। 

इसलिए जो उचित न लगे उसके लिए बोलना चाहिए, आत्म विश्वास एवं स्वाभिमान को ठेस नहीं लगने देनी चाहिए।अनुजों के पांव छूना कितना उचित/अनुचित है ये सभी जानते हैं।

अन्तिमा सिंह 

मेरे विचार हैं कि सिर्फ अपने से बड़े बुजुर्गों के पैर छूना चाहिए छोटों के पैर छूना गलत प्रथा है और दामाद के पैर छूना भी गलत है बल्कि दामाद को सास ससुर के पैर छूने चाहिए क्योंकि वो भी बेटा समान है ।
छोटी ननद के पैर छूना कई घरों में देखा गया है लेकिन वो भी छोटी बहन जैसी होती है तो उसे खुद ही पैर नहीं छूलवाने चाहिए ।


एनी शर्मा 

मेरे ससुराल में यह प्रथा हैं कि ननदों के पैर छूओं चाहे वो छोटी हो।बाकी बहूओं को वहाँ कोई सम्मान नहीं मिलता।

प्रियंका दक्ष 

पैर छूना कौन सी परम्परा के अंतर्गत आता हैं, हम अपने बड़ो के पैर छूते हैं वो उनको इज्जत और सम्मान देते हैं, लेकिन जो छोटे हैं उनको नमस्कार कर सकते हैं, पैर छूने जरुरी नहीं, दिल से सम्मान दो बस और दामाद को अपने बड़ो के पैर छूने चाहिए...
ये मेरी सोच हैं।

रूबी जैन 

परंपराएं इंसानों की बनाई हुई हैं .. पर कैसे इंसान ये सोचने का विषय है.. ऐसी दकियानूसी सोच की परंपराओं का समाप्त हो जाना ही बेहतर होगा।

श्वेता चौहान 

दामाद के पैर, छोटी ननद के पैर छूना,इस प्रकार की सभी प्रथाएं केवल लड़की और उसके परिवार के लिए बनाई गयी हैं, यह सभी पुरुष वादी मानसिकता को दर्शाती हैं ।हम महिलाओं को इन सब कुप्रथाओं का खुलकर विरोध करना चाहिए ।हम बहनों ने कभी भी अपने मम्मी पापा को दामाद के पैर नहीं छूने दिए ।

श्रुति एस के त्रिपाठी 

हमारे यहाँ देवर और दमाद के पैर तो नहीं छुये जाते हैं  ननद के पैर तो छुये जाते हैं| मेरे पापा तो अपनी बहु से भी पैर नहीं छुलवाते  बल्कि किसी भी महिला से नहीं उनका मानना है स्त्री तो देवी रूप होती है और बहु तो लक्ष्मी है तो उससे कैसे पैर छू लवा सकते हैं|

सुषमा तिवारी 

शादी के वक़्त पांव पूजने वाली परंपरा ही अति है.. वैसे नन्द देवर वाला मैंने देखा सुना नहीं है। संस्कारों में अपनों से बड़ो के पांव छूने चाहिए चाहे रिश्ता जो हो।

मेनका उपाध्याय 

मेरा विचार है ये है कि अपने से बड़ो के पैर छूने चाहिए  ।रही दामाद जी की बात तो वो भी अपने सास ससुर से छोटे हैं तो उनको भी अपने पैर नही छुवाने चाहिये बाकी सबके अपने संस्कार  हैं क्या शिक्षा मिलती है इन्हें अपने घर से।

डॉ भारती वर्मा 

मेरी दृष्टि में तो यह परंपरा सही नहीं है। माता-पिता और उनके समकक्ष बड़े-बुजुर्गों के ही पाँव छूने चाहिए। बाकी तो सम्मान देने वाली बात होती है। उसके लिए पैर छूना आवश्यक नहीं, नमस्कार करके भी सम्मान दिया जा सकता है। सही और स्वस्थ परंपरा को मान देकर करना चाहिए, पर इस तरह की परंपराओं को  त्याग देना ही उचित है। छोटों के पैर छुए जा रहे हैं चाहे वे दामाद, ननद, देवर जो भी.... उन्हें स्वयं ही इसके लिए मना करके बड़ों के बड़प्पन को मान-सम्मान देना चाहिए।

स्मिता चौहान 
मुझे नहीं लगता कि पैर छूना गलत है ये हमारी संस्क्रति है ।पैर छूकर बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते हैं,हम मन्दिर जाते हैं तो हर भगवान् की मूर्ति के चरण स्पर्श करते हैं तब बुरा क्यों नहीं मानते क्यो कि वो भगवान् है।ऐसे ही हमारे धरम में बड़े लोगो को भगवान् का दरजा दिया गया है । हाँ छोटो के पैर  छूने के मैं खिलाफ हूँ । वैसे भी अब लोग पैर कहाँ छूते हैं घुटने तक ही हाथ जाता है ।

Adity Saksham

ऐसी कई दकियानूसी सोच हैं जिनको खत्म हो जाना चाहिए हमेशा के लिए जो कि इंसान को बेहतर तरीके से जीने दे खासतौर पर नारी को जीने के लिए मिले।

ममता गुप्ता 

बडो के पैर छूना तो हमारी संस्कृति व संस्कार है। लेकिन छोटा के पैर छूना कभी सुना या देखा नही।

अनु गुप्ता 

हमारे यहां तो ऐसी कोई प्रथाअब  नहीं होती  पहले होती हो तो पता नहीं। हमारे यहां दामाद ही  ससुर के पैर छूते हैं। लेकिन हां बहुत जगह अभी भी ऐसी प्रथा चल रही है जो गलत है। अगर शादी में पैर छूने की ही बात है तो ससुर दामाद के ही क्यों? बहू के क्यों नहीं मतलब लड़के की शादी हो रही है तो लड़की की भी तो हो रही है लड़की का भी तो ससुर है....  बहुत  लोगों को यह  मजाक लग सकता है .... पर जरा सच में सोचिए जब दोनों ही ससुर है और एक ससुर अपने दामाद के पैर छू सकता है तो दूसरा ससुर अपनी बहू के क्यों नहीं?  यह प्रथा ही गलत है यह सिर्फ लड़की वालों को नीचा दिखाने के लिए है और कुछ नहीं और रही बात छोटी नंद और देवर की यह भी गलत है बस एक ही चीज होनी चाहिए कि छोटे बड़ों के पैर छुए चाहे रिश्ता कुछ भी हो।

मधु कश्यप

हमारे यहाँ मामी अपने भाँजा/भाँजी के पैर छूती है।ननद के पैर छूने का भी रिवाज है।मुझे सही नहीं लगता।बड़ों को सम्मान देना चाहिए ।चाहे कोई भी रिश्ता हो।

सुमिता शर्मा 

विवाह के समय तो दामाद को शिवरूप मानकर पाँव छुए जाते हैं दामाद के पर उसके बाद नहीँ  वह भी धर्म का पुत्र ही होता है ।मेरे पति भी मेरी मम्मी के चरण स्पर्श करते हैं,हाँ बड़ों के चरण स्पर्श से आशीर्वाद मिलता है और ज्योतिषीय कारण है कि चन्द्र मजबूत होता है।लेकिन मुझे रुपये  देकर पाँव छूने वाली परमम्परा पसन्द नहीँ। परमम्परा तो वैदिक और वैज्ञानिक ही हैं सारी पर लोगों ने अपने फायदे देख मिलावट की और कुरीति का रूप प्रदान कर दिया। नहीँ तो पहले पर पुरुष का स्पर्श भी निषेध था मात्र दूर से ही प्रणाम की परम्परा थी।

शोभना तरुण सक्सेना 

किसके पाव पूजना चाहिये किसके नही , ये नियम मे ना पड़ कर , (नियम बड़ो द्वारा बड़ो द्वारा बनाये गये है अगर वो बड़े छोटो के पैर छूने से भी खुश हिते है तो छू ले ♥️) जिसके पैर साफ सुथरे हो उसके ही पैर छूने चाहिये । बाहर से आये हुये लोगो के जूते चप्पल पर तो पैर बिल्कुल भी नही bare  hand से नही छूने चाहिये । 

कविता सिंह 

पैर छूकर हम अपने बड़ों के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। मेरे विचार से बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद लेना सौभाग्य की बात है। वहीं किसी परम्परा को निभाने के लिए दामाद , छोटी ननद और देवर का पैर छूना सरासर ग़लत है और ये परम्परा रूढ़िवादिता को बढ़ावा देता है।

प्रतिमा पोद्दार
ये प्रथा बिल्कुल गलत है । दामाद तो बेटा है , देवर  के लिए भाभी मां समान है , ननद छोटी बहन जैसी फिर पैर क्यों छूना ?
पैर छूने का मतलब है बदले में आशिर्वाद अतः पैर बङों के ही छूना चाहिए ।सम्मान देने के और भी कई तरीक़े हो सकते हैं । वैसे मैं झारखंड से हूं मेरे यहां यह प्रथा है ही नहीं ।

संगीता त्रिपाठी 

हमारे यहाँ देवर के पैर नहीं छूते..... हाँ बड़ी नंद के छूते है।... पैर छूना  सम्मान  देने  का तरीका है.... यदि दिल में सम्मान है तभी छूने  चाहिए।.... हमारे यहाँ दामाद ही सास ससुर के पैर छूता है..। सिर्फ शादी के समय माँ बाप कन्यादान के समय छूते है..। बड़ों का पैर छूना अच्छी बात हैउनका आशिर्वाद मिलता है.... इसलिए मुझे पैर छूने में कोई एतराज नहीं है.... वैसे हमारे यहाँ सास, जब नई बहू आती है तो परछन कर उसका पैर छूती है लक्ष्मी मान कर....।

अनिता सिंह 

मेरे विचार से देवर और छोटी ननद के पैर छूना दामाद के साथ ससुर का पैर छूना बिल्कुल गलत है छोटों को ही हमेशा बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए। उस जगह जबरदस्ती परंपरा के नाम पर ऐसा किया जाता है जो कि बिल्कुल ही गलत है । दामाद हो ससुर के पैर छूना चाहिए क्योंकि ससुर पिता समान होते हैं ससुर का दमाद के पैर छूना कुछ समझ नहीं आता है यूपी में तो यह प्रथा बहुत चलती है।

सीमा प्रवीण गर्ग 

हमारे यहां दामाद के पैर तो नहीं छुए जाते। हां शादी के टाइम पर बेटी के जरूर छूते हैं और छोटे ननद देवर के तो बिल्कुल भी नहीं । त्योहारों पर छोटी ननद कह देती हैं हमारी भी पैर छुओ तो छू लेते हैं ।पर रिश्ता अगर बड़ा है सम्मानजनक है तो पैर छूने चाहिए नहीं तो छोटे रिश्ते में तो बिल्कुल भी पैर नहीं छूने चाहिए, और पैर छूने से ही क्या होता है शर्म तो अब आंखों की होती है अगर शब्दों से और दिल से इज्जत दोगे तभी बड़ों की इज्जत होगी। ऐसी कोई प्रथा नहीं है की छोटे के पैर छुए जाएं। पैर छोटा हमारी भारतीय संस्कृति है पर इसे इज्जत के साथ किया जाए ना कि मजाक के लिए।

राधा पटवारी 

अपने से उम्र से बड़ों के पैर छूना हमारी संस्कृति है क्योंकि बड़ों को प्रणाम करने से आयु,विद्या,यश और बल की वृद्धि होती है पर मैं इस बात के बिल्कुल खिलाफ हूँ कि अपने से छोटे उम्र के व्यक्ति चाहें वह दामाद,नंद और देवर के पैर छुऐं क्योंकि दामाद बेटे के उम्र का होता है।दामाद से पैर छुववाने चाहिए न कि उल्टा उसके छूने।हालांकि हमारे घर यह परंपरा नहीं है।छोटे लोग बड़ों से पैर नहीं छुववाते।मेरे पति और जीजाजी मेरे मम्मी-पापा के चरण स्पर्श करते हैं।पर हाँ मैंने कई जगह देखा है लड़की की माता-पिता दामाद के पैर छूते हैं और दामाद अकड़ के खड़ा रहता है..बहुत गलत परंपरा है ये।व्यक्तिगत बात करूँ तो मैं किसी से अपने पैर नहीं छुववाती और हाथ पकड़कर राधे राधे या प्रणाम करती हूँ क्योंकि पैर भी बहुत सोच समझकर छुववाने चाहिए।

तुलिका दास 

बड़े बुजुर्गो के पांव छूकर आशीर्वाद लेना हमारे संस्कार है जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं , वर्तमान में मैं भी यही संस्कार अपने बच्चों को दे रही हूं , पर दामादजी के पांव छूना , पूजना , ननद देवर के पांव छूने जैसी बातें मैंने नहीं देखी कभी , और मुझे ये देखना बिल्कुल पसंद नहीं आएगा , मैं तो वहीं सवाल पूछ लूंगी कि ऐसा क्यों ? अगर ये कही रिवाज है तो इस रिवाज को तुरंत बंद करने की जरूरत है ।

प्रथा के नाम पर भी ऐसा किसी भी सभ्य समाज में नहीं होना चाहिए , नमन बड़ों के चरणों में ही अर्पण होना चाहिए । वैसे हम बंगालियों में जब आते जाते वक्त किसी बड़े के पांव से हमारे पैर छू जाए तो हम अपने बड़ों को पांव छूकर तुरंत प्रणाम करते हैं , ये प्रथा जरूर है , पर सिर्फ बड़ों को ।

दीपिका राज सोलंकी 

हमारी पौराणिक ग्रंथों में कहीं भी इस प्रकार की प्रथा का वर्णन नहीं है। जहां बड़े अपने से छोटों के पैर छुए ,हमारे समाज ने बहू और बहू के परिवार को हमेशा कमजोर रखा है। इस तरह की परंपरा का सहारा लेकर उन्हें और भी कमजोर बनाने  की कोशिश की  जाती है। दमाद घर का नया सदस्य है और उसका स्वागत पैर छूकर नहीं गले लगा कर करना चाहिए , जो लोग इस बात को नहीं मानते हैं तो उनको भी अपनी बहू के पैर छूने चाहिए वह भी तो घर की नई सदस्य है। हमारी सभ्यता में अपने से बड़ों के पैर छूने का प्रचलन है और बड़े हमें खुले दिल से आशीर्वाद देते हैं ताकि हम अपने जीवन में उन्नति  प्राप्त कर सकें। इस प्रकार के खोखले रिवाजों से मान सम्मान नहीं हो सकता अपितु मान सम्मान का हनन होता है।

प्रीति गुप्ता 

अपनों से बड़ों के पैर छूने से उनका  आर्शीवाद और दुलार मिलता है। मुझे खुद से दूसरों से पैर छुलाना पसंद नहीं ।मैं कहती हूँ "पैर मत छुओ गले ,मिले तो प्यार बढ़ेगा"।वैसे मेरे यहाँ के दामाद कभी अपने बड़ो से पैर नहीं छुलाते।वैसे हमारे समाज में नंद के पैर तो छुये जाते,मगर देवर का मैने पहली बार सुना है।देवर तो खुद उल्टा भाई और भाभी के पैर छूता है।वैसे कुछ रुढिवादी परंपराओ को बदलना चाहिए ।और अगर इसको बदलना है ,तो अपने घर से बदलाव शुरू करो।

सारिका रस्तोगी 

बड़ों के चरणस्पर्श में कहीं कोई आपत्ति नही है पर मुझे ये अज़ीब लगता है कि लड़की के माता पिता लड़के के माता पिता के पैर छूते हैं ।क्या औचित्य है इसका? सम्मान देने के विभिन्न तरीके हैं पर ये तरीका मुझे समझ नही आया।छोटी नन्दों के भांजियों के पैर छूने मे कोई आपत्ति नही क्योंकि उन्हे कन्या स्वरूप मानकर (बायना) देकर या किसी विशेष अवसर पर पैर छुए जा सकते हैं ।सीधे शब्दों में जहाँमन मे सम्मान हो और  उम्र में बड़े हो तो पैर छूकर सम्मान देने में कोई दुविधा नही ।

रुचि श्री 

मैं इन परंपराओं के खिलाफ हूं।जो। मां बाप को पूजनीय हैं,जिनके पांव बड़े आदर से सभी छोटों को छूना चाहिए । इन परंपराओं के नाम पे बड़ों को अपमानित करना उचित नहीं है।हालांकि किसी किसी जगह ही ये परंपराओं का चलन हैं।

अर्पणा जैसवाल 

बड़ो के पैर छूकर आशिर्वाद लेना हमारी परम्परा है। हमारे समाज की संकीर्ण मानसिकता है,सब रीति रिवाज बहू और उसके घरवालों के लिए है। दामाद को भगवान बना दिया जाता है। पैर पूजने की रस्म के साथ अपनी ही बेटी को सदा खुश रखने की विनती करते हैं।लेकिन ससुराल में बहू से अच्छे से पैर दबा-दबा कर पैर छूने को कहा जाता है। अपने से छोटे ननद और देवर का भी ओयदा (पद) बड़ा बता कर पैर छूने को कहते हैं। यह सभी रिवाज गलत है,इन्हीं रिवाजों के कारण बहू और उसके मायके को उचित सम्मान नहीं मिलता। पहल हमको ही करना होगा क्यूंकि रिवाज हम ने ही बनाये,तो उसके विरूध भी हमें ही आवाज उठानी होगी।

शरनजीत कौर 

इस मामले में खुशकिस्मत हूँ कि हमारे परिवार में ऐसी कोई परंपरा नहीं है, बड़ों का आशीर्वाद अवश्य लिया जाता है पैर छू कर, पर दामाद और किसी भी अन्य का जो उम्र में छोटा है उसके पैर नहीं छुए जाते हैं ।

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