क्या एक महिला पंडित नहीं हो सकती ?

क्या एक महिला पंडित नहीं हो सकती ?

हमारा देश अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है। हमारे देश में अलग-अलग धर्म और अलग-अलग जाति के लोग रहते हैं। सभी धर्म के लोग अपने लिए अलग-अलग रीति रिवाज और परम्परा बनाते हैं और उस परम्परा को वो पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते हैं।


हमारे देश में कुछ परंपराएं ऐसी है जो लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देती है। जहां हम एक तरफ़ कहते हैं कि महिला और पुरुष में कोई असमानता नहीं है। वहीं कुछ परंपराएं ऐसी है जो महिला और पुरुष के बीच के अंतर को बढ़ावा देती है। आज मैं अपने देश अपने समाज की उसी परम्परा के बारे में बताना चाहती हूं जो हम वर्षों से देख रहे हैं। 

आज मैं आप सबसे पंडित के बारे में बात करना चाहूंगी। मैं हिन्दू धर्म की हूं और बचपन से ही मैंने अपने घर में आयोजित पूजा पाठ में पुरुष पंडित को देखा है। छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मंदिरों में भी पुरुष पंडित ही भगवान की पूजा अर्चना करते हैं।

हमारे समाज में पुरुष पंडित की प्राथमिकता , महिला और पुरुष के बीच के अंतर को दर्शाता है। अपने ही समाज में हम दोहरी मानसिकता के साथ जीतें हैं ‌ जहां एक तरफ़ हम  घर की औरतों को लक्ष्मी मान कर घर में होने वाली रोज़ की पूजा औरतों से कराते हैं वहीं दूसरी ओर अगर कोई महिला पंडित बनकर दूसरों के घरों पूजा कराना चाहती है तो समाज उस महिला पंडित को स्वीकार नहीं करते क्योंकि हम समाज में रहकर यही देखते आए हैं पूजा हमेशा पुरुष पंडित ही कराते हैं।

जब एक पुरुष और महिला एक-समान हैं । हर क्षेत्र में जब वे एक-दूसरे के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल सकते हैं । जब एक महिला डॉक्टर, इंजीनियर , वैज्ञानिक, आई ए एस ऑफिसर और ना जाने कितने क्षेत्र में पुरुष के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रही है तो क्या महिला पुरुष पंडित परम्परा को नहीं तोड़ सकती !!

हमारे समाज में अगर ये परम्परा टूटती है तो भविष्य में हम अपने अपने घरों में आयोजित शादी ब्याह, सत्यनारायण स्वामी की कथा और छोटे , बड़े मंदिरों में पूजा पाठ कराने वाली महिला पंडित को ही देखेंगे।

समाज में बदलाव लाने के लिए कुछ परम्पराओं में परिवर्तन लाना बहुत जरूरी है।


#परम्परा

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