क्या हक हैं हमें नवरात्र मनाने का

क्या हक हैं हमें नवरात्र मनाने का


"कल से शुरू हो रहे चैत्र नवरात्रि की सभी को हार्दिक बधाई ओर शुभकामनाएँ"
नवरात्रि त्यौहार प्रति वर्ष मुख्य रूप से दो बार बनाया जाता है। हिंदी महीनों के अनुसार पहला नवरात्रि चैत्र मास में मनाया जाता है तो दूसरा नवरात्रि अश्विन मास में मनाया जाता है। नवरात्रि के 9 दिनों तक चलने वाली पूजा अर्चना के बाद दसवें दिन को दशहरा के रूप में बड़े ही जोर शोर से मनाया जाता है। महिषासुर नामके राक्षस ने सूर्य देव, अग्नि देव, वायु देव, स्वर्ग के देवता इंद्र देव सहित सभी देवताओं पर आक्रमण कर उनके अधिकार छीन लिए। चूँकि देवताओं ने पहले महिषासुर को अजेय होने का वरदान दिया था तो कोई भी देवता उसका सामना नहीं कर सका इसलिए सभी देवताओं ने माँ दुर्गा से स्तुति की कि वे महिषासुर राक्षस से युद्ध करें और उसका संहार करके हमें उसके प्रकोप से मुक्त करें। देवताओं की विनती मानते हुए माँ दुर्गा ने महिषासुर से लगातार नौ दिनों तक युद्ध किया और महिषासुर का वध किया। तभी से माँ दुर्गा की नौ दिनों तक पूजा अर्चना की जाती है और उसको हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है
नवरात्रि के दौरान हर घरों में मां के नौ रूपों का पूजन किया जाता है और आखिरी नवरात्रि के दिन शास्त्र अनुसार कंजक या कन्या पूजन करने का हमारे देश में विधान है। ये कंजक पूजन अष्टमी व नवमी पर किया जाता है। इस दिन छोटी कन्याओं को देवी माँ का रूप मानकर पूजा जाता है। कन्‍या पूजन की शुरुआत कन्‍याओं के चरण धोने से होती है। इसके बाद उनको भगवती दुर्गा को लगा चने, हलवा-पूरी, खीर, पुए आदि का भोग का पूरी श्रद्धा से कन्याओं को खिलाया जाता है। इसके बाद उनसे झुककर आशीष लिया जाता है। सत्य और समर्पण भाव से उनको माता ही मानकर उनके आशीर्वाद को स्वीकार करने की यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है।
शास्त्रों के अनुसार कन्‍या पूजन के बिना नवरात्रि पूजा के फल की प्राप्ति नहीं होती है। नवरात्र शक्ति उपासना का पर्व है। देवी पूजा के साथ साथ प्रतीक रूप में कन्या को देवी मानके उनके चरणों का पूजन करने से माता शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। पर........
क्या हक है हमें नवरात्री मनाने का ?
जिस देश में हर दिन हज़ारों बच्चियाँ रोंद दी जाती हो घटिया मानसिकता वाले राक्षसों के हाथों।
वो रोता हुआ लम्हा ठहर गया है हमारे  दिल की अंजुमन में, कचोटता है जब कन्याओं को देवी का दर्ज़ा देकर पूजते है सब 
खून के कतरों से बदहाल या जली हुई जब मासूमों की लाश देखते ही
कराह उठता है मन क्या बितती होगी मासूम पर.! नहीं होंगी मातारानी खुश, नहीं पहुँचेगी किसीकी आराधना उसकी चौखट तक, इस अंधे, गूँगे, बहरे समाज में किसीको हक नहीं अपने मुँह से दुर्गा माँ का नाम लेने का भी सिर्फ़ मोमबत्तियाँ जला लेने से या जब घटनाएं घटती है तब चार दिन नूराकुश्ती करने से वो गुनाह मिट नहीं जाता, करने वाले गुनाह करते है पर गुनाह होता हुआ देखना और देखकर भी चुप रहना सबसे बड़ा गुनाह है। 
सड़े हुए न्यायतंत्र का भेड़ बकरी की तरह अनुसरण करना भी गुनाह है, पहले गंदी सड़ी मानसिकता को जड़ से खत्म करो समाज में जो बिमारी फैला रहे है बहन बेटियों को नौचने की उसे जला ड़ालो 
तब तक मत मनाओ नवरात्री जिस रुप को पूजते हो उसीको वहसियत से रोंदते हो। ये ढ़ोंग छोड़ दो बेटियों को माँ दुर्गा समझकर पूजने का, या न्याय दिलाओ पहले उन तमाम खिलती कलियों को जिसे खिलने से पहले ही कुचल दिया गया है।
क्या गलती होती है सिर्फ़ सात आठ महीने की फूल सी बच्ची की महज़ एक लड़की होने की कितनी बड़ी किंमत चुका रही है, समाज के एसे दरिंदों को फ़ांसी पर लटका दो, उन माँओं को इंसाफ़ दिलाओ जिनकी बेटियाँ बली चढ़ी है राक्षसों के हाथों उन राक्षसों की बलि चढ़ाओ। मासूमों की रक्षा के लिए कड़े कायदे बनाओ,स्त्री के हर रुप को सम्मान दिलाओ फिर मातारानी को भोग चढ़ाओ, उसके बाद नवरात्री नहीं मनाओ तब भी माँ दुर्गा खुश होंगी।।

(भावना ठाकर,बेंगुलूरु)#भावु

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