माँ का आँचल

माँ का आँचल

मै जानती हु वक़्त के पहिये लगे होते है कभी रुकता नही,,,बस अपनी कदर कराना नही भूलता,,,वो बचपन वक़्त के साथ बस याद बनकर रह जाता हैं...
मुझे याद है किस तरह वक़्त की सुहिया मुझे तुम्हारा इंतज़ार करने पर मजबूर करती थी
कब 5:30 बजेंगे और कब तुम ऑफिस से लोट कर आओगीई,,,और फिर हम साथ मे बैठ कर चाय पियेंगे,..फिर तुम पूछोगी आज क्या खायेगी क्या बनाऊ,,
इतना थकने के बाद भी एक माँ ही हो सकती है जो इतने प्यार से इतने एनर्जी से ये सवाल करे
सच मे तुम बहुत याद आती हो माँ,,,
उठ जाओ मेरे ऑफिस जाने का वक़्त हो गया है,,, सोने दोना तुम फिर से चाय बनाकर लाओगी तब उठुगी,,,
दूध पी लेना खाना खा लेना मैं फ़ोन करके पुछुगी,,,,
सच मै तुम बहुत याद आती हो माँ
हर सुबह मेरी हथेली पे अश्क़ बनके आती हो माँ
आज नहाने का मन नही है बहुत ठंडी है ,,,तो किसने कहा नहाने को आजा खाना खाले कल नाहले ना,,,,
वो ठंडी का मौसम और मेरे हाथो का बर्फ बन जाना,,,और तुम्हे बार बार पकड़ना चिपक के सोना ,,,और तुम्हारा कहना शादी के बाद माँ नही मिलेगी,,,
वो पानी का अचानक मेरे आँखों से बहना मुझे शादी नही करना मुझे शादी नही करना,,,
सच मुझे बहुत याद आती  हो तुम
वो कही भी जाना पुरे रस्ते तुम्हारा हाथ थामे रहना,,,ये दिलादो ना प्लीज ,,,,वो एकबार मे तुम्हारा मना करना,,और फिर मेरा ज़िद पे आना,,,और तुम्हारा झुक जाना
सच मैं मेरे हर पल मैं समां जाती हो तुम
अव बहुत याद आती हो तुम
मेरी हर ज़िद को पूरा करना चाहे वो बड़ी हो या छोटी,,,बस पूरी करना वो लड़ना झगड़ना फिर मुझको मनाना,,,
क्यों इतना सताती हो तुम 
क्यों इतना याद आती हो तुम,,,
आज वक़्त फिर वही है और बाते भी वही है,,,कल जो थी बच्ची आज माँ बन गयी है,,,रूठना भूलकर ,मानाने लगी है,,
खुद की नींदे उड़ाकर उसको सुलाने लगी है,,,कल सुनी थी जो लोरी आज सुनाने लगी है ,खुद की भूक से पहले उससे खिलाने लगी है,,,
फिर भी मुझको मेरी माँ याद आने लगी है

#मेरे शहर से जुड़ी मेरी यादें

#अगस्त ब्लॉग कांटेस्ट

धन्यवाद
सोनिया चेतन कानूनगों

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