माँ का चौका

माँ का चौका

 कितना अच्छा विषय है मां बाबा की रसोई ।अभी परसों ही मैं  अपनी मायके गई ,वहां हम बहन भाई बैठकर मम्मी की रसोई और मिट्टी के चूल्हे की बात कर रही थी ।मम्मी कि रसोई मेरे दिमाग घूम गई । सब हम भाई-बहन उस टाइम को उस समय के खाने को बहुत मिस कर रहे थे । कभी फिर अचानक  में मुझे याद आया अरे ....हमें तो यह टास्क मिला है... "माँ की रसोई" के ऊपर लिखने का ,तो मैं  इस विषय पर  लिखने बैठ गई  ......
कभी नहीं सोचा था कि बाबा की भी रसोई होती है हमेशा मां की ही रसोई देखी ।हमेशा मां को ही काम करते देखा आज भी जब मैं अपनी रसोई देखती हूँ ,माँ की सूरत की रसोई बहुत याद आती है।
मायके का वो अपना घर मेरी माँ की वो रसोई जिसको हम किचन नहीं चौका कहते थे 
माँ बनाती थी खाना और हम उसके आस पास रहते थे
जहाँ मिट्टी के चूल्हों पर तेरा खाना पकाना, पापा का एक गिलास पानी भी अपने आप ना लेना सारा काम मां तू ही करती थी उस समय तो पता भी नहीं था कि पापा भी रसोई में काम करते होंगे। मैं सोचा था माँ ही रसोई में काम करती हैं।
बड़े ही अच्छे ढंग से रखी हर चीज,डिब्बों में बिना लेबल के जान जाती कि किसमें दाल है किसमें चावल।
फिर बहुत कुछ बदला माँ के उस चौके में चूल्हा से स्टोव और फिर गैस आ गयी। पर माँ के हाथों का वो अनमोल स्वाद नहीं बदला वह अब भी उतना ही बेहिसाब होता है
"कोई  दूर तक नहीं उस स्वाद के मुकाबले में
वो संसार में सबसे अनोखा और लाजवाब होता है।"
 शादी के बाद में मैंने जाना पापा की भी रसोई होती है ।क्योंकि मैंने अपने ससुर को देखा कि कुछ खास फेस्टिवल या मेरी ननंद जब भी आती थी तो हमारे पापा जी अपने हाथ की सब्जी जरूर बनाते थे ,और किसी त्यौहार पर भी कोई सब्जी बनानी होती तो हम लोग तैयारी करके देते और हमारे पापा यह सब बनाते हमें बहुत अच्छा लगता। हमें आश्चर्य भी होता कि अच्छा... पापा भी काम करते हैं। फिर अब मैं अपने हस्बैंड को भी देखती हूं यह भी टाइम टाइम पर मेरी हेल्प करते हैं। बल्कि सुबह की चाय और कभी मैं बीमार होती हूँ तो रसोई में थोड़ा बहुत खाना पीना वह भी देख लेते हैं। सच आज की नारी रसोई तक ही सीमित होकर नहीं रह गई है ,वह भी अपने मन की करने लगी है और अपने लिए भी टाइम निकालती है ,और यह सब घर में एक दूसरे के सहयोग से ही हो पाता है।

 #मां बाबा की रसोई

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0