मैं आज भी तुमसे हार गई

मैं आज भी तुमसे हार गई

नीलू ने आज भी रितु और उसके ग्रुप की लड़कियों को यह कहते हुए सुन लिया था कि आज भी यह मेहंदी प्रतियोगिता एक टाँग वाली लड़की लंगडी ही जीतेगी ।  अपने ही कानों से अपने बारे में ऐसा सुनकर भी वह ना ही रोई और न ही उदास हुई । शायद उसे आदत हो गई थी अपने बारे में अपने नाम की जगह लंगडी शब्द सुनने की। 

नीलू एक बेहद सुंदर-सुशील और होनहार लड़की थी। वह पढ़ाई-लिखाई में जितनी अच्छी थी, उतनी ही व्यवहार से भी सरल थी । अगर उसमें कोई कमी थी तो केवल यही कि वह ठीक तरह से चल नहीं पाती थी क्योंकि बचपन में पोलियो हो जाने के कारण उसकी एक टाँग बेजान ही रह गई थी । 

नीलू का जीवन इस कमी के कारण काफी संघर्षमय तो जरूर था परन्तु नीलू का आत्मविश्वास ऐसा था कि जिसके कारण वह कभी दूसरे बच्चों से कम दिखाई नहीं देती थी। पढ़ाई -भाषण-मेंहदी-ड्रांइग हरेक प्रतियोगिता में भागीदारी करना और फिर इनाम भी जीतना यह सब उसके लिए बहुत आसान था । 

इन सबके अलावा नीलू में एक खास गुण था और वह था संगीत में रुचि । नीलू की आवाज बहुत सुरीली और मधुर थी । जब भी स्कूल में गाना गाने की बात होती तो नीलू का नाम सबसे पहले लिया जाता था। उसके माता-पिता को भी उसके इस गुण के बारे में पता था। इसलिए वे नीलू को अलग से संगीत शिक्षा दिलवा रहे थे ।

रितु भी यूँ तो पढ़ने में अच्छी थी परंतु उसे हमेशा द्वितीय स्थान ही मिलता था और यही कारण था कि वह नीलू को एक आँख भी बर्दाश्त नहीं कर पाती थी । हमेशा उससे ईर्ष्या भावना रखती थी । अपनी सहेलियों के साथ मिलकर नीलू को लंगडी-लंगडी कहकर अपमानित करती रहती थी, परेशान करती रहती थी ।

इसी तरह की बातों के चलते कब दोनों 12वीं कक्षा तक पहुँच गई मानो पता ही ना चला । इसी बीच नीलू के पिताजी की ट्रांसफर भुवनेश्वर हो गई और नीलू ने स्कूल छोड़ दिया । भुनेश्वर को आप टेंपल सिटी ऑफ़ इंडिया के नाम से भी जानते हैं ।

इस बार जब 12वीं का परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो प्रथम स्थान रितु को मिला । यूँ तो वह बहुत खुश थी परंतु उसे नीलू की याद रह-रहकर सता रही थी । उसे अपनी उन गलतियों का पछतावा भी हो रहा था जो उसने नीलू का अपमान करके की थी ।

समय बीतता चला गया। रितु अपनी पढ़ाई पूरी करके एक शिक्षिका बन गई। जीवन के इस लंबे सफ़र में उसे अक्सर नीलू की याद भी आया करती थी ।

आज रितु अपने स्कूल के बच्चों को लेकर कोनार्क जा रही थी। वहाँ एक राष्ट्र स्तरीय संगीत प्रतियोगिता हो रही थी। जहाँ रितु के स्कूल के बच्चे भी प्रतिभागी बन रहे थे। 

जिस दिन संगीत प्रतियोगिता होनी थी , रितु ठीक समय पर अपनी टीम को लेकर प्रतियोगिता हाल में पहुँच गई । जैसे ही मुख्य अतिथि पहुँचे , तालियों की गड़गड़ाहट से सारा हाल गूँज उठा । मुख्य अतिथि के रुप में व्हीलचेयर पर एक खूबसूरत पतली-लंबी सी महिला को मंच पर देख और उसका परिचय सुनकर तो ऋतु के पैरों तले जमीन खिसक गई । 

एक महान संगीतकार 'नीलू जी' चलिए ….मिलते हैं उनसे, उन्हीं की जुबानी - संचालक महोदय द्वारा जब यह बोला गया तो रितु को पूरा विश्वास हो गया कि यह वही नीलू है , जिसके लिए वह अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाती। 

अब मंच पर बैठी संगीतकार नीलू जी ने अपना परिचय देते हुए कहा - मुझे यहाँ तक पहुँचाने में निसंदेह मेरे परिवार का बहुत बड़ा योगदान है परंतु साथ ही मेरे वे सभी मित्र  जिन्होंने हमेशा ही मुझे यह अहसास कराया कि किसी कमी के होते हुए भी मैं बहुत कुछ कर सकती हूँ , उनकी भी मेरी सफलता में अहम भूमिका है । यह सुनते ही  रितु की आँखों में आँसू आ गए।उसे अपने किए पर बहुत शर्मिंदगी हो रही थी। वह स्वयं को नीलू के सामने बहुत छोटा महसूस कर रही थी ।

कार्यक्रम के समाप्त होते ही वह भागकर नीलू के पास पहुँची ।

नीलू ….नीलू……. उसने आवाज़ लगाई।

नीलू ने उसे पहचानते हुए कहा - रितु …. तुम रितु ही हो ना ।

नीलू मुझे माफ कर दो । मैं आज भी तुम से हार गई । मैं तुमसे कभी नहीं जी सकती - वह रोते हुए बोली ।

नीलू ने उसे प्यार से गले लगा लिया और बोली- रितु …. शरीर की कमी कोई कमी नहीं , बशर्ते हम कभी मन से विकलांग नहीं होने चाहिए । 

सच है दोस्तों शरीर की कमी कोई मायने नहीं रखती , यदि आप अपने मन से और अपनी इच्छाशक्ति से पूरी तरह मजबूत हैं।

उम्मीद करती हूँ कि आपको यह कहानी पसंद आई होगी।

Madhu Dhiman

Pink Columnist-Haryana

#Nobodyshaming

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