मैं बेटी न हो सकीअब स्वयं को यह समझाने लग गई।

मैं बेटी न हो सकीअब स्वयं को यह समझाने लग गई।

दोस्तों 

जैसा कि अबकी बार 'थर्सडे पोएट्री' का विषय रखा गया है 'मैं बेटी ना हो सकी' यह बात काफी हद तक सही ही है । आप जितने भी खुले विचारों वाले या जितने भी अच्छे परिवार में क्यों ना ब्याही जाएँ परंतु जो एक बहू के दायित्व होते हैं वह तो आपको निभाने ही होते हैं । बहुत ज्यादा प्यार करने वाले परिवार में भी बेटी और बहू की आज़ादी के बारे में भी अंतर देखने को मिल जाता है।

परंतु फिर भी पहले से स्थिति में कुछ सुधार है और धीरे-धीरे , आगे-आगे यह सुधार बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है ।

लेकिन फिर भी 'मैं बेटी ना हो सकी' विषय को ध्यान में रखते हुए यह कविता आप सबके लिए -

खूबसूरत सा एक सपना अब सजाने लगी थी ,

बाबुल का छोड़, साजन का घर जचाने लगी थी ।

ससुर में पिता , सास में माँ का रूप पाने लगी थी, 

ननद में बहन-देवर में भाई का रूप लाने लगी थी।

हर किसी की जिम्मेदारी को अपना फर्ज बनाने लगी थी, छोटी - बड़ी हर जिम्मेदारी से अपने काँधे लदाने लगी थी। 

सबके काम करते-करते अपने शौक भुलाने लगी थी ,

खुश रखते-रखते सभी को गम अपने छुपाने लगी थी। 

ससुर जी की दवाई,खान-पान का हिसाब लगाने लगी थी,  

सासू माँ को भी रामायण व गीता का पाठ सुनाने लगी थी । 

दर्द पीड़ा को भी अपनी अब मरहम से भगाने लगी थी, 

कुछ नहीं-कुछ नहीं, इन शब्दों में घाव सारे छुपाने लगी थी। 

मेरी भी हैँ इच्छाएँ और ढेरों सपने मन ही में दबाने लगी थी, अपने सपनों की जगह बाकी सबके सपने जगाने लगी थी। 

भूमिका बहू की निभाते हुए बेटी होना बिसराने लगी थी,  

मैं बेटी ना बन सकी , अब स्वयं को यह समझाने लग गई।

मधु धीमान

पिंक कॉलमनिस्ट-हरियाणा

What's Your Reaction?

like
2
dislike
0
love
1
funny
0
angry
0
sad
0
wow
1