#नखरे मै भी थकती हूं

#नखरे मै भी थकती हूं

शिखा..... यार जब पकौड़े बनाये हैं तो साथ में हरी चटनी भी बनाती ना।"

"जरुर बनाती पतिदेव..... अगर आप हरा धनिया लेकर आते। मैंने तो कल भी कहा था आपसे की आते समय लेते आना....... पर आपको याद रहे तब ना।"

"मैं भुल गया तो क्या हुआ..... तुम ही याद करके ले आती।"

"हां सब काम मैं ही याद रखुं और आप बस मौज करो यहां बैठकर।" इतना कहकर शिखा गुस्से में पकोड़े की प्लेट वही अजय के सामने रखकर किचन में चली गई। आज ना चाहते हुए भी शिखा को गुस्सा आ ही गया आखिर कब तक खुद को संभालती।  घर का हर छोटा से बडा काम शिखा के ही जिम्मै था। वैसे शिखा को जल्दी से गुस्सा नहीं आता है लेकिन हर इंसान की एक हद होती है। गुस्से में शिखा ने फटाफट कुकर में खिचड़ी चढ़ाकर 2 सीटी लगा दी और गैस बंद करके अपने कमरे में चली गई।

इस समय वह किसी से भी बात नहीं करना चाहती थी फिर चाहे अजय हो या फिर बच्चे। आज गुस्से में शिखा का सर फटा जा रहा था मन का गुबार बाहर आने को मचल रहा था। लेकिन किसे कहें अपने मन की बात........  कोई सुनने वाला भी तो नहीं था। अजय शुरू से ही अपने आप में रहते थे।  शिखा अजय के लिए सब कुछ करने को तैयार थी लेकिन अजय घर का कोई भी काम नहीं करना चाहते थे। और मम्मी जी.......  वह भी तो यही कहती थी कि "घर का मर्द है झूठी थाली भी अंदर उठा कर नहीं रख सकता। पूरा दिन ऑफिस में मेहनत करता है अब क्या घर पर आकर भी तुम्हारी चाकरी करें" बस इन्हीं बातों की वजह से अजय ने भी कभी शिखा की मदद नहीं करनी चाही। जब बच्चे छोटे थे तब भी शिखा अकेले ही बच्चों को संभालती और घर भी संभालती थी साथ साथ अजय को सब चीज हाथ में देने की आदत उसे हो गई थी। समय के साथ मम्मी जी परलोक सिधार गई लेकिन छोड़ गई अपने पीछे एक दकियानूसी सोच कि मर्द घर का कोई काम नहीं करते हैं और अजय हमेशा इस पर अडिग रहे। यहां तक तो फिर भी ठीक था लेकिन अब इसी सोच का असर शिखा के दोनों बेटों पर भी हो रहा था वह भी अपनी मां के दिए हुए संस्कारों को भुलाकर पिता के नक्शे कदम पर चल रहे थे। पानी का गिलास भी अगर नहीं चाहिए तो आवाज मां को ही लगाते थे। टोकने पर जवाब एक ही होता था कि पापा भी तो ऐसा ही करते हैं। शिखा कई बार दोनों बेटों समर और नैतिक को समझाने की कोशिश करती की "चाहे लड़का हो या लड़की उसे हर काम आना जरूरी होता है फिर चाहे वह घर के अंदर का काम हो या घर के बाहर का।"  लेकिन दोनों की आंखों पर पिता ने इस घमंड की पट्टी बांधी थी कि वह लड़के हैं इसीलिए घर का कोई भी काम नहीं करेंगे।

आज दोनों बेटे 18 साल की हो चुके है और शिखा भी उम्र के उस पड़ाव पर है जब हारमोंस चेंज होते हैं और शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है इस समय शिखा के लिए पूरा घर संभालना और पति के साथ साथ दोनों बेटों को सब चीज हाथ में देना बहुत मुश्किल हो गया है। आज भी जब शिखा उठी तो न जाने क्यों कमर में हल्का हल्का दर्द था। उसे लगा कि शायद एक-दो घंटे में ठीक हो जाएगा लेकिन दर्द तो धीरे-धीरे बढ़ता ही चला गया। ऐसे में दोनों बेटों ने फरमाइश की इटली सांभर की अजय इटली सांभर नहीं खाते इसीलिए उन्होंने आलू के पराठे का आर्डर दिया। बेटों को समझाने की कोशिश की थी शिखा ने की आज रहने दो कल बना दूंगी लेकिन बेटे भी जिद पर अड़े थे। ना ही बेटो ने शिखा की दर्द को समझा.....  ना हीं अजय का ध्यान दर्द से कराहती हुई शिखा के मुरझाए हुए चेहरे पर गया।  जैसे तैसे नाश्ते का काम समेट कर शिखा ने खुद भी एक पराठा खाया और पेन किलर ले ली। थोड़ी देर बाद जब दर्द में कुछ राहत मिली तो घर की साफ सफाई की और बाकी के काम समेटने लगी। इस बीच फिर से दोनों बेटे किसी ने किसी काम के लिए अपनी मां को बुला ही लेते।  जिससे वजह से शिखा को आज बहुत गुस्सा आ रहा था कि आखिर क्यों मम्मी जी ने यह सोच अजय और दोनों बेटों के दिमाग में डाल दी है कि "लड़के घर का काम नहीं करते।"

अरे मम्मी तुम यहां बैठी हो........  एक बात बताओ आज रात को क्या बना रहे हो खाने में.........?  कुकर की सीटी की आवाज आई थी छोले भटूरे बनाने का प्लान है क्या?" बेटे समर ने पूछा।  छोले भटूरे का नाम सुनते ही शिखा का गुस्सा फूट पड़ा -  "एक बात बताओ बेटा........  क्या तुम जानते नहीं हो कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है फिर भी सुबह से मैं तुम्हारा सब काम कर रही हूं और एक तुम हो कि आर्डर पर आर्डर दिए जा रहे हो यह बना दो, वह बना दो, यह कर दो, वह कर दो। पानी का एक गिलास भी उठाकर तुम खुद से नहीं पीते हो। मैं तुम्हारी मां हूं नौकरानी नहीं माना कि एक मां अपने बच्चों के लिए सब कुछ कर सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तुम उस चीज का नाजायज फायदा उठाओ। क्या तुम्हें सुबह से दिखाई नहीं दे रहा है कि मैं जैसे-जैसे दवाई लेकर घर का सारा काम कर रही हूं ऐसे में तो तुम्हारा फर्ज बनता है कि तुम घर के छोटे-मोटे काम करो घर संभालो ताकि मैं कुछ देर आराम कर सकूं लेकिन नहीं तुम्हें तो सारा काम अपनी मम्मी से ही करवाना है।"

"अरे क्या हो गया....... क्यों चिल्ला रही हो समर पर....... तबीयत ठीक नहीं है तो सो जाओ ना गुस्सा क्यों हो रही हो।" कमरे में प्रवेश करते हुए अजय ने तंज कसा।

माफ कीजिएगा अजय लेकिन आज आप तो बोलिएगा भी मत........ पिछले 20 साल से मैं आपके इस दकियानुसी सोच को बर्दाश्त कर रही हूं कि लड़के घर का काम नहीं करते और इसीलिए आपने कभी मेरी मदद नहीं की। आपको अपना हर सामान हाथ में चाहिए होता था फिर चाहे वो आपके मोजे हो रुमाल हो या फिर टिफिन हो। आपने तो अपनी झुठी  थाली तक कभी उठाकर किचन में नहीं रखी। आपने कभी नहीं सोचा कि आपकी बीवी भी एक इंसान है वह भी थक सकती है उसे भी आराम की जरूरत है लेकिन नहीं.…...... औरत है ना...... पूरा दिन घर में काम करेगी लेकिन थकेगी नहीं। किसी काम में कोई गलती भी नहीं कर पाएगी मशीन जो है सब कुछ परफेक्ट करेगी। अजय आपसे भी बड़ी गलती हुई मुझसे कि मैंने समय रहते अपने दोनों बेटों को इसी सोच से आजाद नहीं कराया। उनके मन में भी यही बात घर कर गई है कि घर का काम केवल औरते हीं करती है मर्द नहीं लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।  मेरी तबीयत ठीक नहीं है खिचड़ी मैंने बना दी है आप खाइए और सो जाइए......... जो करना है कीजिए......... लेकिन मुझे अकेला छोड़ दीजिए और कल से सब अपना अपना काम खुद करेंगे घर का जितना काम मुझसे हो सकेगा मैं उतना करूंगी। कोई भी मुझे कोई काम करने के लिए बाध्य नहीं करेगा।  मैं भी इंसान हूं मैं भी थकती हूं।"  इतना कहकर शिखा ने कंबल ओड़ा और तकिये पर सर रखकर चैन की नींद सो गई। शायद इतनी प्यारी नींद उससे पहले कभी नहीं आई थी आज उसके मन का गुबार, गुस्सा सब बाहर आ चुका था दिल मैं एक अलग ही सुकून और शांति थी।

#नखरे

धन्यवाद

रुचिका खत्री

       

         

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